जीवन में पेलम पेला है

अब चारो ओर झमेला है,

क्या महाभारत की बेला है,

तिल तिल मरती मानवता,

जीवन में पेलम पेला है।

भीड़ भरी इस दुनिया में,

इंसान खड़ा अकेला है,

सुख चैन खोजने भाग रहा,

जिस ग्रह पर दुःख का मेला है।

विज्ञान भरी इस दुनिया में,

नैतिकता का कहां बसेरा है,

परेशान भगवान भी हैं,

इस जग का कहां सवेरा है।

सोच जरा हे नश्वर प्राणी,

क्या तेरा क्या मेरा है,

कुछ करना है तो, कर अच्छा,

यह जग माया का फेरा है।

हाहाकार अशांत है जग,

क्या चलाचली का बेला है

कुछ सूझ रहा नहीं मुझको

ये भी साला एक खेला है।

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