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बात बिगड़ जाती है।

Image Courtesy Twitter

मेरे पास

खामोशी के सिवा

कोई हल नही

मैं बात करता हूँ

तो बात बिगड़ जाती है…!

कुछ खामोशियां,

कुछ बेहिसियां,

और कुछ बदगुमानियां,

कोई भी मज़बूत ईमारत हो

रिश्तों की बुनियाद खा जाती हैं…!

लफ़्ज़ों की चापलूसी,

बाजार के ये रिश्ते

और स्वार्थ की ये दुनिया

सादगी ईमान के

इंसान को खा जाती है।

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एक छोटी सी कविता from heart.

Social Apps के दौर में सब Porn लेकर आए थे,

हम बहुत खराब थे, जो Blog लेकर आए थे।