
मेरे पास
खामोशी के सिवा
कोई हल नही
मैं बात करता हूँ
तो बात बिगड़ जाती है…!
कुछ खामोशियां,
कुछ बेहिसियां,
और कुछ बदगुमानियां,
कोई भी मज़बूत ईमारत हो
रिश्तों की बुनियाद खा जाती हैं…!
लफ़्ज़ों की चापलूसी,
बाजार के ये रिश्ते
और स्वार्थ की ये दुनिया
सादगी ईमान के
इंसान को खा जाती है।
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