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पनौती कौन …… राजा या…

तेनाली रामाकृष्णा विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेवराय के दरबार के अष्टदिग्गजों में से एक थे। अपनी कुशाग्र बुद्धि और हास्य बोध के कारण प्रसिद्ध हुये। राजा कृष्णदेव राय के राज्य में चेलाराम नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसके बारे में कहा जाता था कि अगर कोई सुबह-सुबह उसका चेहरा देख ले तो उसे दिनभर खाने को कुछ नहीं मिलता। इसलिए लोग उसे पनौती कहकर पुकारते थे।


एक दिन यह बात राजा के कानों तक जा पहुंची। वह जानना चाहते थे कि क्या चेलाराम सच में इतना मनहूस है? अपनी इस उत्सुकता को दूर करने के लिए उन्होंने चेलाराम को महल में हाजिर होने का बुलावा भेजा। चेलारम सच्चाई से अंजान खुशी-खुशी महल के लिए चल पड़ा। महल पहुंचने पर राजा उसे देखकर सोचने लगे कि यह तो दूसरों की भांति सामान्य प्रतीत होता है। यह दूसरे लोगों के लिए कैसे मनहूसियत का कारण हो सकता है।

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परखने के लिए उन्होंने चेलाराम को अपने शयनकक्ष के सामने वाले कमरे में ठहरने का आदेश दिया। चेलाराम को राजा के कमरे के सामने वाले कमरे में ठहराया गया।
अगली सुबह राजा कृष्णदेव राय उसे देखने के लिए कमरे में आए। उन्होंने चेलाराम को देखा और फिर अपने जरूरी काम के लिए चले गए।

संयोगवश राजा को सभा के लिए जल्दी जाना पड़ा, इसलिए सुबह का नाश्ता नहीं किया। सभा की बैठक इतनी लंबी चली कि सुबह से शाम हो गई। राजा को भोजन करने का समय न मिला। थके-हारे, भूखे राजा शाम को भोजन के लिए बैठे ही थे कि परोसे हुए खाने में मक्खी पड़ गई। उन्होंने भोजन न करने का निर्णय किया। भूख व थकान से राजा का बुरा हाल था। गुस्से में उन्होंने इस बात का दोषी चेलाराम को ठहराया। उन्होंने स्वीकार कर लिया कि वह एक मनहूस व्यक्ति है।
उन्होंने चेलाराम को मृत्युदंड की सजा सुना दी।

जब यह बात चेलाराम को पता चली तो वह भागा-भागा तेनालीराम के पास पहुंचा। उसे मालूम था कि इस सजा से उसे केवल तेनालीराम ही बचा सकते हैं। उसने अपनी पूरी व्यथा सुनाई। तेनालीराम ने उसे आश्वस्त किया कि वह डरे नहीं और जैसा कहें वैसा करे। फांसी के समय चेलाराम को लाया गया। उससे पूछा गया कि क्या उसकी कोई आखरी इच्छा है? जवाब में चेलाराम ने कहा, वह राजा समेत पूरी प्रजा के सामने कुछ कहना चाहता है। सभा का एलान किया गया। सभा में पहुंचकर चेलाराम बोला, “महाराज, मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि अगर मैं इतना मनहूस हूं कि जो कोई मुझे सुबह देख ले तो उसे दिन भर भोजन नसीब नहीं होता, तो आप भी मेरी तरह एक मनहूस हैं।”


यह सुन सभी लोग भौचक्के रह गए। राजा क्रोधित होकर बोला, “तुम्हारी ये मजाल, तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?”
चेलाराम ने जवाब दिया, “महाराज, उस दिन सुबह सबसे पहले मैंने भी आप ही का चेहरा देखा था और मुझे मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। इसका अर्थ तो ये हुआ कि आप भी मनहूस हैं, जो कोई सुबह सबसे पहले आपका चेहरा देख ले उसे मृत्युदंड मिलना तय है।”

चेलाराम की यह बात सुनकर महाराज को एहसास हुआ कि चेलाराम निर्दोष है। उन्होंने शीघ्र ही उसे रिहा करने का आदेश दिया और उससे माफी मांगी। अंत में चेलाराम से पूछा कि उसे ऐसा कहने के लिए किसने कहा था? चेलाराम ने जवाब दिया तेनालीराम के अलावा कोई और मुझे इस मृत्युदंड से नहीं बचा सकता था। इसलिए मैंने उनके समक्ष जाकर अपने प्राणों की गुहार लगाई थी।

लड़ते लड़ते

कश्मकश इस जिंदगी की

मिटती नहीं ऐ दोस्त

सुपुर्द ए खाक हो जाउंगा

लड़ते लड़ते एक रोज।

कहां कम है, मेरा जुनून

कभी आजमा के तो देख

हारता हूं, पर हारा नहीं मैं।

मेरे इरादे हैं बड़े नेक।

नहीं मलाल है, तेरी शोहरतों का

मैं एक इंकलाब हूं ऐ दोस्त

जिंदा रहकर देखूंगा सब कुछ

सागर की तरह बनकर खामोश।

कैसे दिन बीते कोई जतन बता जा

जीवन में जब ऐसे पल आते हैं कि आदमी बेवश हो जाता है और उम्मीद की कोई किरण दिखाई नहीं देती तो ऐसे आदमी को क्या करना चाहिए। मुझे नहीं मालूम। पता नहीं कितने लोगों के जीवन में ऐसा घटित होता होगा। मेरे जीवन में कुछ ऐसा ही चल रहा है। लेकिन इससे मुझे एक सीख मिल रही है कि जीवन में कितना भी भयंकर कष्ट हो, कितनी भी बड़ी मुसीबत आए, कभी नाउम्मीद नहीं होना चाहिए। गौर से देखने पर पाता हूं कि जिन मुसीबतों को देखकर हिम्मत टूट रही है वो तो अभी आयी ही नहीं हैं। ये तो मन की चाल है जो यह डर दिखाता है कि तुम्हारा समय कैसे बीतेगा। लेकिन डर तो लगता ही है साहेब। अब इस डर से हाथ पैर पटकने का मतलब है कि साहस को कमजोर करना।

गूगल

फिर दिल कहता है ये जीवन तो एक तमाशा है यार। यह कितनी अच्छी बात है। दिल और आत्मा को सुकून देती है। अब इस तमाशे को कैसे झेलना है‌‌। जिन्हें भगवान या नसीब ने या उनकी अपनी मेहनत ने कुछ दिया है वे उन लोगों का तमाशा बनाते हैं जो अपनी जिंदगी से पहले ही परेशान चल रहे हैं। ताने मारने से लेकर नीचा दिखाने तक की कोशिशें की जाती हैं उस इंसान के लिए जिसे उसकी जिंदगी ने ही जलील कर दिया है। आजकल तो कुछ ज्यादा ही हो रहा है।

घूस चूस कर करो कमाई

करो पढ़ाई बनो कलक्टर, रौशन कर लो नाम

घूस चूस कर खूब कमाओ, भाड़ में गया ईमान

कबीरा सारा रा रा रा ।

माई बिक रही दादा बिक रहे, बिक रहे गांव समाज

नीयत बिक रही भाव बिक रहे, बेशर्म हुआ इंसान

कबीरा सारा रा रा रा ।

धन दौलत पर नारी बिक रही, पैसा बना भगवान

धन की खातिर भाई लड़ रहे, बाप हैं सब परेशान

कबीरा सारा रा रा रा ।

चापलूस दलालों के चंगुल में, तड़प रहा समाज

मेहनत कर्मठ निष्ठाओं का, कहीं नहीं सम्मान

कबीरा सारा रा रा रा ।

All Images Courtesy Twitter

मैं वक्त के हाथों में खिलौने की तरह था।

आज के ब्लॉग में मैंने ट्विटर से कुछ बेहतरीन प्रेरणादायक ट्विट्स लिए हैं। इन्हें पढ़कर मन को सुकून मिलता है। टूटे हुए दिल को हौंसला मिलता है। आशा करता हूं कि ये प्रयोग आपको अच्छा लगेगा। आप चाहें तो इन्हें अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर स्टेटस के रूप में भी लगा सकते हैं।

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दुनिया कितनी लाचार है।

चापलूस दलालों की

अब होती जय जय कार है

इसीलिए इस दुनिया का

अब हो रहा सत्यानाश है।

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बेच रहे ईमान सरासर

पाप सभी स्वीकार है

इंसा का इंसा पर अब तो

नहीं रहा ऐतबार है।

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चारो ओर है अंधियारा

बढ़ रहा अत्याचार है

शांति सौहार्द की आस नहीं

दुनिया कितनी लाचार है।

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जीवन में पेलम पेला है

अब चारो ओर झमेला है,

क्या महाभारत की बेला है,

तिल तिल मरती मानवता,

जीवन में पेलम पेला है।

भीड़ भरी इस दुनिया में,

इंसान खड़ा अकेला है,

सुख चैन खोजने भाग रहा,

जिस ग्रह पर दुःख का मेला है।

विज्ञान भरी इस दुनिया में,

नैतिकता का कहां बसेरा है,

परेशान भगवान भी हैं,

इस जग का कहां सवेरा है।

सोच जरा हे नश्वर प्राणी,

क्या तेरा क्या मेरा है,

कुछ करना है तो, कर अच्छा,

यह जग माया का फेरा है।

हाहाकार अशांत है जग,

क्या चलाचली का बेला है

कुछ सूझ रहा नहीं मुझको

ये भी साला एक खेला है।

अपना अस्तित्व बचाने को अपनों से लड़ना पड़ता है

इस पोस्ट में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कुछ कालजयी कविताओं की चुनिंदा पंक्तियां आपके साथ साझा कर रहा हूं। आशा है इन्हें पढ़कर आपको अच्छा लगेगा।

नित जीवन के संघर्षो से,

जब टूट चूका हो अंतर मन।

तब सुख के मिले समंदर का,

रह जाता कोई अर्थ नहीं।

क्षमा शोभती उस भुजंग को,

जिसके पास गरल हो।

उसको क्या, जो दन्तहीन,

विषरहित, विनीत, सरल हो?

जीवन का मूल समझता हूँ,

धन को मैं धूल समझता हूँ।

सौभाग्य न सब दिन सोता है,

देखें, आगे क्या होता है ।

और अधिक ले जांच,

देवता इतना क्रूर नहीं है,

थक कर बैठ गए क्या भाई,

मंजिल दूर नहीं है।

अपना अस्तित्व बचाने को

अपनों से लड़ना पड़ता है,

जब भीष्म अधर्म के रक्षक हों

तो अर्जुन बनना पड़ता है।

टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,

बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,

फण शेषनाग का डोलेगा,

विकराल काल मुँह खोलेगा।

नित जीवन के संघर्षो से,

जब जग जाए अंतर्मन।

फिर सुख की चाह नही,

क्या जीवन और क्या मरन ।।

दुर्योधन! रण ऐसा होगा।

फिर कभी नहीं जैसा होगा।