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लड़ते लड़ते

कश्मकश इस जिंदगी की

मिटती नहीं ऐ दोस्त

सुपुर्द ए खाक हो जाउंगा

लड़ते लड़ते एक रोज।

कहां कम है, मेरा जुनून

कभी आजमा के तो देख

हारता हूं, पर हारा नहीं मैं।

मेरे इरादे हैं बड़े नेक।

नहीं मलाल है, तेरी शोहरतों का

मैं एक इंकलाब हूं ऐ दोस्त

जिंदा रहकर देखूंगा सब कुछ

सागर की तरह बनकर खामोश।

कैसे दिन बीते कोई जतन बता जा

जीवन में जब ऐसे पल आते हैं कि आदमी बेवश हो जाता है और उम्मीद की कोई किरण दिखाई नहीं देती तो ऐसे आदमी को क्या करना चाहिए। मुझे नहीं मालूम। पता नहीं कितने लोगों के जीवन में ऐसा घटित होता होगा। मेरे जीवन में कुछ ऐसा ही चल रहा है। लेकिन इससे मुझे एक सीख मिल रही है कि जीवन में कितना भी भयंकर कष्ट हो, कितनी भी बड़ी मुसीबत आए, कभी नाउम्मीद नहीं होना चाहिए। गौर से देखने पर पाता हूं कि जिन मुसीबतों को देखकर हिम्मत टूट रही है वो तो अभी आयी ही नहीं हैं। ये तो मन की चाल है जो यह डर दिखाता है कि तुम्हारा समय कैसे बीतेगा। लेकिन डर तो लगता ही है साहेब। अब इस डर से हाथ पैर पटकने का मतलब है कि साहस को कमजोर करना।

गूगल

फिर दिल कहता है ये जीवन तो एक तमाशा है यार। यह कितनी अच्छी बात है। दिल और आत्मा को सुकून देती है। अब इस तमाशे को कैसे झेलना है‌‌। जिन्हें भगवान या नसीब ने या उनकी अपनी मेहनत ने कुछ दिया है वे उन लोगों का तमाशा बनाते हैं जो अपनी जिंदगी से पहले ही परेशान चल रहे हैं। ताने मारने से लेकर नीचा दिखाने तक की कोशिशें की जाती हैं उस इंसान के लिए जिसे उसकी जिंदगी ने ही जलील कर दिया है। आजकल तो कुछ ज्यादा ही हो रहा है।

घूस चूस कर करो कमाई

करो पढ़ाई बनो कलक्टर, रौशन कर लो नाम

घूस चूस कर खूब कमाओ, भाड़ में गया ईमान

कबीरा सारा रा रा रा ।

माई बिक रही दादा बिक रहे, बिक रहे गांव समाज

नीयत बिक रही भाव बिक रहे, बेशर्म हुआ इंसान

कबीरा सारा रा रा रा ।

धन दौलत पर नारी बिक रही, पैसा बना भगवान

धन की खातिर भाई लड़ रहे, बाप हैं सब परेशान

कबीरा सारा रा रा रा ।

चापलूस दलालों के चंगुल में, तड़प रहा समाज

मेहनत कर्मठ निष्ठाओं का, कहीं नहीं सम्मान

कबीरा सारा रा रा रा ।

All Images Courtesy Twitter

बात बिगड़ जाती है।

Image Courtesy Twitter

मेरे पास

खामोशी के सिवा

कोई हल नही

मैं बात करता हूँ

तो बात बिगड़ जाती है…!

कुछ खामोशियां,

कुछ बेहिसियां,

और कुछ बदगुमानियां,

कोई भी मज़बूत ईमारत हो

रिश्तों की बुनियाद खा जाती हैं…!

लफ़्ज़ों की चापलूसी,

बाजार के ये रिश्ते

और स्वार्थ की ये दुनिया

सादगी ईमान के

इंसान को खा जाती है।

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मैं वक्त के हाथों में खिलौने की तरह था।

आज के ब्लॉग में मैंने ट्विटर से कुछ बेहतरीन प्रेरणादायक ट्विट्स लिए हैं। इन्हें पढ़कर मन को सुकून मिलता है। टूटे हुए दिल को हौंसला मिलता है। आशा करता हूं कि ये प्रयोग आपको अच्छा लगेगा। आप चाहें तो इन्हें अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर स्टेटस के रूप में भी लगा सकते हैं।

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दुनिया कितनी लाचार है।

चापलूस दलालों की

अब होती जय जय कार है

इसीलिए इस दुनिया का

अब हो रहा सत्यानाश है।

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बेच रहे ईमान सरासर

पाप सभी स्वीकार है

इंसा का इंसा पर अब तो

नहीं रहा ऐतबार है।

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चारो ओर है अंधियारा

बढ़ रहा अत्याचार है

शांति सौहार्द की आस नहीं

दुनिया कितनी लाचार है।

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भगवान ढूंढने जब मैं निकला

भगवान ढूंढने जब मैं निकला

मन में प्रबल जिज्ञासा थी

पर जीवन के संघर्षों के आगे

कहीं नहीं कोई आशा थी।

Google

पग पग धोखे मिलते थे

सब भेष बदलकर मिलते थे

दुनिया के तानों को सह कर भी

हम अपनी धुन में रहते थे।

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धन वैभव की चाह नहीं थी

दिन भर चिंतन करते थे

आंख गड़ा सब मुझे निहारें

सनकी पागल कहते थे।

Google

नहीं राह आसान भक्त की

रह रह कर कांटे चुभते हैं

क्या तकलीफें देकर ही श्रीमन

सच्चे भगत परखते हैं।

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जीवन में पेलम पेला है

अब चारो ओर झमेला है,

क्या महाभारत की बेला है,

तिल तिल मरती मानवता,

जीवन में पेलम पेला है।

भीड़ भरी इस दुनिया में,

इंसान खड़ा अकेला है,

सुख चैन खोजने भाग रहा,

जिस ग्रह पर दुःख का मेला है।

विज्ञान भरी इस दुनिया में,

नैतिकता का कहां बसेरा है,

परेशान भगवान भी हैं,

इस जग का कहां सवेरा है।

सोच जरा हे नश्वर प्राणी,

क्या तेरा क्या मेरा है,

कुछ करना है तो, कर अच्छा,

यह जग माया का फेरा है।

हाहाकार अशांत है जग,

क्या चलाचली का बेला है

कुछ सूझ रहा नहीं मुझको

ये भी साला एक खेला है।

तुम कब सुधरोगे इंसान

आज के इंसान की सोच इतनी गिर गिर चुकी है कि वह हर किसी को नीचे गिराना चाहता है, दूसरे को अपमानित कर, व्यंग्य कसकर मनोरंजन करना चाहता है। कोई भी पेशा हो कोई भी शहर हो कैसी भी छोटी बड़ी कंपनी हो, चमचों और दलालों की पैठ इतनी गहरी जम चुकी है कि वे मिटाए ना मिटे। मुझे यह समझ नहीं आता कि इन नीच घिनौनी हरकतों से किसी को क्या हासिल होता होगा। गा़ंव, मोहल्ले, शहर हर जगह नीचों, दुष्टों और हरामियों का बोलबाला है।

ये गोलबंदी का युग है। गोलबंदी उन शैतानी ताकतों का जिनके जीवन में न कोई नैतिकता है और ना ही कोई सिद्धांत। इनके जीवन में सिर्फ पैसे और सबसे आगे रहने की भूख है भले ही इसके लिए उन्हें गंदे से गंदा और घटिया से घटिया हरकत क्यों ना करनी पड़े।

ऐसी ओछी हरकतों से तुम्हें कुछ पैसे अधिक मिल जाता होगा कुछ सम्मान मिला जाता होगा लेकिन यह भी सच है नासमझों कि इससे तुम्हारे जीवन में सुकून तो बिल्कुल भी नहीं आता होगा। आखिर एक दूसरे के खिलाफ साजिश करके तुम्हें क्या मिलता है। जितना दिमाग तुम दूसरों को नीचा दिखाने में लगाते हो उतना खुद को बेहतर बनाने में क्यों नहीं लगाते जिससे तुम्हारे जीवन में शांति और आनंद आए।

मेरा कई जगहों पर काम करने का अनुभव है। हर जगह सिर्फ और सिर्फ चापलूसी, चापलूसों का बोलबाला है। इनके मकड़जाल को तोड़ना आसान नहीं है। ऊंचे पदों पर बैठे लोग या तो इस नीच मंडली का हिस्सा बन जाते हैं या कुंडली मारकर आंख मूंदकर मजा लेते हैं। वहीं संस्थाओं के मालिकों की दिलचस्पी सिर्फ पैसा बनाने में है। क्या इंसान जीवन में कुछ अच्छा करने की चाह से विरत हो गया है या इंसान यह भूल गया है कि वह इंसान है। इस समस्या ने बहुत कुछ नष्ट कर रखा है। गांव के गांव उजड़ गए। पंचायत राज व्यवस्था ने गांवों में लोगों को गोलबंदी के दलदल में धकेल दिया। लोगों को जाति संप्रदाय के नाम बांटते बांटते दरार इतनी गहरी कर दी इंसान की जिंदगी कूड़ेदान से बदतर हो गयी। पैसा कमाने के पीछे इंसान नंगा नाच रहा है।

इन विकृतियों को देखकर मुझे भी कुछ अहसास हो रहा है। शायद मौत का त्योहार आने वाला है। क्योंकि….

जब जब मानवता मरती है

पृथ्वी पापों से लदती है

तब इसे बचाने हे प्राणी

प्रकृति प्रकट कुछ करती है।