Category: religion festival rakshabandhan

The Blog

एक छोटी सी कविता from heart.

Social Apps के दौर में सब Porn लेकर आए थे,

हम बहुत खराब थे, जो Blog लेकर आए थे।

एक विश्व युद्ध और ….. निर्णय

क्षमा करें, मैं युद्ध, विध्वंस, विनाश, बर्बादी और तबाही का पैरोकार नहीं हूं। युद्ध एक विभीषिका है, मानवता के लिए अभिशाप है। लेकिन कभी कभी यह मानवता की रक्षा करने के लिए जरूरी हो जाता है। लगता है वह समय नज़दीक है। वर्तमान परिस्थितियां भी विश्व युद्ध का ही संकेत दे रही हैं। पूरी दुनिया में इस समय हलचल है। कूटनीति अपने सबसे चरम बिन्दु पर है। दुनिया दो धड़ों में विभाजित दिखाई दे रही है। कुछ देशों ने अपने अपने पक्ष भी चुन लिए हैं। यूक्रेन में लंबे समय से युद्ध चल रहा है। हजारों मारे जा चुके हैं हजारों बेघर हो चुके हैं। अमेरिका की चौधराहट को चुनौतियां मिल रही हैं। रूस और चीन जैसे बड़े देशों के साथ साथ ईरान जैसे छोटे मुल्क भी लंबे समय से अमेरिका के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं। भारत भी दो पक्षों पर चुनौतियों का सामना कर रहा है। जम्मू कश्मीर को लेकर पाकिस्तान तो अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन से भारत का निर्णायक टकराव आज नहीं तो कल होना ही है। आर्मेनिया और अज़रबैजान रुक रुक कर गोला बारूद की अदला बदली कर ही लेते हैं। इजरायल और फिलिस्तीन की जन्मजात दुश्मनी और संघर्ष बातचीत से हल नहीं होने की दूर दूर तक आस दिखाई नहीं दे रही। इथोपिया अपने पड़ोसी देश इरीट्रिया से संघर्ष कर रहा है।

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इन अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के बीच राष्ट्रों के मध्य आर्थिक प्रतियोगिता, देश के नागरिकों का जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर एक दूसरे के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणियां ये बताती हैं कि अब लोगों में धैर्य और सहनशीलता ख़त्म हो चुकी है। अब इंसान में सोचने और विचारने की क्षमता क्षीण हो चुकी है। अब हर कोई अपने को दूसरे से श्रेष्ठ साबित करना चाहता है। अपने विचार अपनी परंपरा अपनी जात और अपना संप्रदाय। कोई किसी को नष्ट करने की बात कर रहा है कोई किसी को। बात इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि अब एक दूसरे के धर्म को नष्ट करने की धमकियां दी जा रही हैं। सुनने में आया है कि किसी दो कौड़ी के नेता ने सनातन को नष्ट करने की इच्छा व्यक्त की है। कम से कम कोई भी सच्चा धर्म दूसरे धर्म को नष्ट करने की मंशा नहीं रखता। और अगर कोई ऐसी भावना पालता है तो प्रकृति उसे उसके धर्म के साथ खुद ही नष्ट कर देती है। ये सारी परिस्थितियां ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि जल्द ही पूरी दुनिया उथल पुथल के दौर से गुजरने वाली हैं।

जब इंसानी फितरत और स्वभाव इस कदर उग्र हो जाए कि वह अपनी जाति, परंपरा, संगठन, संप्रदाय के नाम पर मानवता, समाज, मूल्य, परंपरा और सिद्धांतों की तिलांजलि देने को तैयार हो तो समझ लेना चाहिए कि विध्वंस की बेला दरवाजे पर दस्तक दे रही है। धनबल से निर्बल सताया जा रहा है। असमानता की बात उठाकर लोगों को बरगलाया जा रहा। असमानता तो प्रकृति के मूल में है। एक ही मिट्टी के दो कण कभी भी एक समान नहीं हो सकते लेकिन महत्व दोनों का एक समान है। सृष्टि का सौन्दर्य ही इस बात में समाहित है कि उसकी विषमता में ही समत्व का भाव छिपा है। ज़रुरत है इसी भाव को समझने की ना कि एक दूसरे को एक दूसरे पर थोपने की। धरातल पर समानता लाने की बात मूर्खता है। हां वैचारिक और आत्मिक समानता विषमता में पहले भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी। लेकिन लोगों की समझ में यह बात तब आएगी जब वे एक भयंकर कालचक्र से गुजरेंगे। मुझे ऐसा लगता है कि वह समय बहुत नजदीक है। बहुत सारे लोगों ने अपनी भविष्यवाणियों में इसका संकेत पहले ही दे चुके हैं। दुनिया को चेताने वाले आज भी सावधान कर रहे हैं। लेकिन दुनिया की समझ में यह बात आए तो बात बने।

जलता हुआ आदमी

चौंकिए मत। हम यहां किसी जलते हुए आदमी की दास्तां नहीं बताने आए हैं। हम आपको अमेरिका के एक सांस्कृतिक त्योहार के बारे में बताने जा रहे हैं जोकि इस समय चर्चा में है। 27 अगस्त से शुरू हुए आयोजन में खलल पड़ गई है जिसकी वजह से 70 हजार लोग कीचड़ में फंस गए हैं और एक व्यक्ति की मौत भी हो चुकी है। आयोजन के पहले दिन के बाद की पूरी रात भयंकर बारिश हुई और आगे भी इसकी संभावना बनी हुई है।

Courtesy twitter

दरअसल जलता हुआ आदमी यानी बर्निंग मैन अमेरिका का एक सांस्कृतिक त्योहार है। इसका प्रथम आयोजन 1990 में अमेरिका के नेवादा में स्थित राक शहर के मरुस्थल में हुआ था। इसकी स्थापना जून 1986 में लैरी हार्वे और उनके मित्र जेरी गोडेल ने ग्रीष्म संक्रांति के समय सैन फ्रांसिस्को के बाकर बीच पर लकड़ी के बने एक आदमी को जलाकर की थी।

इस कार्यक्रम में शामिल होने दुनिया भर से लोग आते हैं। लेकिन इस दौरान उन्हें सेलफोन और इंटरनेट जैसी सुविधाओं से दूर रहना होता है। पारम्परिक नाच गाने और नृत्य के बीच उन्हें रहना पड़ता है। प्रकृति को नुक़सान पहुंचाने वाली चीजों के इस्तेमाल पर मनाही है। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को मनमाफिक जीने की आजादी दी जाती है ताकि वे स्वतंत्रता का मतलब समझ सकें।

चुंबन का कंपन

चुंबन एक अनुष्ठान है, संस्कार है। इससे प्रेम, सम्मान और दुलार पनपना है, बशर्ते वह मर्यादित आचरण में हो। अन्यथा चुंबन कंपन पैदा करता है। पिछले दिनों ही चुंबन से जुड़ा एक वाकया हुआ है जिस पर चर्चा छिड़ गई है।


दरअसल स्पेन की फुटबॉल टीम की प्रमुख खिलाड़ी जेनी हार्मोसो का स्पेन फुटबॉल संघ के अध्यक्ष द्वारा चुंबन लिए जाने की चर्चा जोर पकड़ रही है। हाल ही में स्पेन की महिला फुटबॉल टीम ने पहली बार विश्व कप जीता और जीत के जश्न में तत्कालीन फुटबॉल संघ के अध्यक्ष लुईस रुबियालेस ने टीम की खूबसूरत खिलाड़ी जेनी हार्मोसो का चुंबन ले लिया जिसके फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। इसे लेकर फुटबॉल संघ अध्यक्ष की आलोचना और निंदा हो रही है। इसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया है।
हमारे देश में भी चुंबन को लेकर विवाद होते रहे हैं। आपको याद होगा वो दृश्य जब संसद में अपना वक्तव्य देने के बाद जाते समय सांसद राहुल गांधी ने दूसरी महिला सांसद स्मृति ईरानी की तरफ फ्लाइंग किस का प्रदर्शन किया था और दूसरे दिन ईरानी ने इसे असभ्य व्यवहार कहकर उनकी भर्त्सना की थी जिसे आप इस लिंक पर क्लिक कर देख सुन सकते हैं।
https://twitter.com/scribe9104/status/1689197568004366336?s=20
दूसरा विवाद भी राहुल गांधी से ही जुड़ा हुआ है। लगभग 7 माह पहले एक रैली के दौरान सार्वजनिक तौर पर उन्होंने अपनी बहन प्रियंका गांधी का चुंबन ले लिया था। चुंबन लेने की भाव भंगिमा बहुत विचित्र थी जिसकी कुछ लोगों ने आलोचना भी की थी। https://youtube.com/shorts/wPRg2iamwIo?si=pP5Pbl755PSSo1Ts
अभी हाल ही में एक फिल्म के प्रीमियर के दौरान मशहूर फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र और अभिनेत्री शबाना आजमी के बीच चुंबन चर्चा का विषय बना था।

Going

Egyptian Pyramid

Some of the most iconic and enduring architectural marvels in human history are the Egyptian pyramids.

Built by ancient Egyptians, over a period of several centuries these colossal structures served as monumental tombs for their pharaohs and important individuals. Located near the Nile River in the northeastern part of Egypt, the most famous pyramid complex is at Giza, just outside of modern-day Cairo.

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The most significant pyramid-building activity occurred during the Old Kingdom period. The construction spanned different dynasties and periods, with

roughly from 2630 BCE to 1750 BCE. The primary purpose of Egyptian pyramids was to serve as elaborate tombs for deceased pharaohs and high-ranking individuals. Believing in an afterlife the Egyptians designed pyramid to protect the pharaoh’s body and belongings for eternity.

Characterized by their distinctive pyramid shape, Egyptian pyramid were constructed with a square base and four triangular sides that meet at a point at the top. This design was believed to symbolize the sun’s rays.

To honor the deceased pharaoh, a mortuary temple for rituals and offerings were made Adjacent to the pyramid. To facilitate the movement of priests and offerings a causeway or long corridor were made which led from the mortuary temple to a valley temple or a pyramid town.

Inside pyramid, a central chamber containing a granite sarcophagus was placed to preserve the pharaoh’s body.

Astronomical phenomena, such as the cardinal points or celestial bodies were often carefully aligned with the pyramids.

Great Pyramid of Giza:

Characterized by their distinctive pyramid shape, Egyptian pyramid were constructed with a square base and four triangular sides that meet at a point at the top. This design was believed to symbolize the sun’s rays.

To honor the deceased pharaoh, a mortuary temple for rituals and offerings were made Adjacent to the pyramid. To facilitate the movement of priests and offerings a causeway or long corridor were made which led from the mortuary temple to a valley temple or a pyramid town.

Inside pyramid, a central chamber containing a granite sarcophagus was placed to preserve the pharaoh’s body.

Astronomical phenomena, such as the cardinal points or celestial bodies were often carefully aligned with the pyramids.

Great Pyramid of Giza:

This is the largest and most famous Egyptian pyramid. This is also known as the Pyramid of Khufu or the Pyramid of Cheops,. It was built for Pharaoh Khufu and is part of the Giza pyramid complex. It is considered one of the Seven Wonders of the Ancient World.

Pyramid of Khafre: This is the second-largest pyramid at Giza, built for Pharaoh Khafre. It looks taller than the Great Pyramid due to retaining some of its original casing stones. Pyramid of Menkaure: The smallest of the three main pyramids at Giza, built for Pharaoh Menkaure. The exact methods used to build the pyramids remain the subject of study and debate. It is generally believed that they were constructed using a combination of skilled labor, massive limestone or granite blocks, and a system of ramps to move and position the stones. The Egyptian pyramids are not only remarkable feats of engineering and architecture but also hold immense cultural and historical significance. They are symbols of the power and divinity of the pharaohs and provide valuable insights into ancient Egyptian beliefs, rituals, and society.
Today, the Egyptian pyramids continue to be among the most visited and studied archaeological sites in the world, attracting millions of tourists and researchers who seek to unravel the mysteries of these ancient structures.

“अब मैं दुनिया का विनाशक, मृत्यु बन चुका हूं।”

जूलियस राबर्ट ओपेनहाइमर जोकि जे राबर्ट ओपेनहाइमर के नाम से मशहूर हैं, एक बहुत ही जाने माने भौतिक विज्ञान शास्त्री हैं। इनकी कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विकसित एटम बम से जुड़ी हुई है। 22 अप्रैल 1904 को जन्मे ओपेनहाइमर ने बचपन से भौतिक शास्त्र में अपनी रुचि दिखानी शुरू कर दी थी। उन्होंने हावर्ड यूनिवर्सिटी में अध्ययन किया और बाद में जर्मनी के गाटिंगटन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और वहीं से डाक्ट्रेट की उपाधि हासिल की। ओपेनहाइमर अपनी काबिलियत कें दम पर अपने समय के प्रमुख सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री बन गये। क्वांटम मैकेनिज्म और क्वांटम फील्ड के क्षेत्र में उनकी महती भूमिका है।


लेकिन उनके जीवन में नाटकीय मोड़ तब आया जब वो मैनहाटन परियोजना से जुड़े। यह एक गुप्त योजना थी जिसके अंतर्गत दुनिया के पहले एटम बम को विकसित किया जाना था। योजना के वैज्ञानिक निदेशक के रूप में ओपेनहाइमर ने भौतिक विज्ञान के क्षेत्र से बौद्धिक लोगों को एक साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ताकि एटम बम को बनाया जा सके। उन्होंने न्यू मैक्सिको के लास एलमास प्रयोगशाला का नेतृत्व किया जहां पर ऐतिहासिक खोज और विकास की परियोजनाएं बनाई जाती थीं।
एटम बम बनाने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल और नैतिक रूप से चुनौतीभरा कार्य था क्योंकि इससे दुनिया में बहुत बड़े विनाश के होने का खतरा था। लेकिन ओपेनहाइमर के नेतृत्व ने इस परियोजना में आने वाली सभी चुनौतियों और अभियांत्रिकी समस्याओं पर विजय प्राप्त की। यद्यपि ओपेनहाइमर इस योजना के प्रति पूर्णतया समर्पित थे फिर भी वे इस बात से पूरी तरह वाकिफ थे कि इस घातक हथियार के नैतिक परिणाम क्या होंगे। 1945 में दुनिया के पहले एटम बम के सफल परीक्षण के तुरंत बाद ओपेनहाइमर ने प्रसिद्ध हिन्दू धर्म शास्त्र भगवत् गीता के एक श्लोक के अर्थ को व्यक्त किया था जो इस प्रकार है।
“अब मैं दुनिया का विनाशक मृत्यु बन चुका हूं।”
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ओपेनहाइमर एटामिक ऊर्जा और हथियारों पर नियंत्रण की वकालत करने लगे। अपने राजनैतिक विचारधारा और वामपंथी झुकाव के कारण उन्हें कठिनाईयों का सामना भी करना पड़ा और 1954 में उनको मिली सरकारी सुरक्षा वापस ले ली गई। यहीं से उनके जीवन में कठिनाईयों का दौर शुरू हो गया और विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान पर राजनीति विवाद भारी पड़ने लगे।

Julius Robert Oppenheimer


अपने जीवन में आने वाले इन संघर्षों के बावजूद वे अपना अध्ययन अध्यापन और खोज संबंधी कार्यों का निष्पादन करते रहे। फिर भी भौतिकी के क्षेत्र में वह प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में बने रहे और अपने योगदान के लिए उन्हें बहुत सारे सम्मान भी प्राप्त हुए। 18 फ़रवरी 1967 को उनका देहावसान हो गया लेकिन अपने पीछे वे वैज्ञानिक खोजों और परमाणविक हथियारों के विकास की विरासत छोड़ गए।

All images Courtesy: Twitter

This blog is a Hindi translation of a article from twitter. You can read the original article by accessing the following link 👇👇👇

A Hero Of Humanity

There are a lot of stories of heroes who lived for humanity and obeying the rules of God. Today In this blog I will expose you one such Hero who saved the lives of thousands in the 2nd World War by following the voice of soul.

Chiune Sugihara. Image courtesy: twitter account historic vid

Chiune Sugihara, a Japanese diplomat who served as the vice-consul of the Japanese Consulate in Kaunas, Lithuania during World War II.

Defying the orders of his superiors, he issued transit visas to over 6,000 Jews to enter in Japan.

He worked tirelessly nearly one month, writing visas by hand until the consulate was closed.

Image courtesy: twitter account historic vid

He later said, “I may have to disobey my government, but if I don’t, I would be disobeying God. I knew that somebody would surely complain about me in the future. But I myself thought this would be the right thing to do. There is nothing wrong in saving many people’s lives….The spirit of humanity, philanthropy…neighborly friendship…with this spirit, I ventured to do what I did, confronting this most difficult situation—and because of this reason, I went ahead with redoubled courage.”

Sugihara died in July 31st, 1986 at the age of 86. He was recognized as Righteous Among the Nations by Israel in 1985.

The lesson that we should take from him is that Recognize the inherent value in every person, our shared humanity transcends all barriers. This story is a call to see ourselves in others and act with compassion, even in the face of great risk.

रक्षाबंधन:: 30 अगस्त की रात 9 बजकर 3 मिनट से 31 अगस्त की सुबह 7 बजकर 7 मिनट तक है राखी बाँधने का शुभ मुहूर्त30 अगस्त की रात 9 बजकर 3 मिनट से 31 अगस्त की सुबह 7 बजकर 7 मिनट तक है राखी बाँधने का शुभ मुहूर्त

रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहनों के आपसी प्रेम का प्रतीक है। रक्षाबंधन पर बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षाबंधन बांधती हैं। 

मुहूर्त शास्त्र के अनुसार रक्षाबंधन का त्योहार हमेशा भद्रा रहित काल में मनाना शुभ होता है। अगर रक्षाबंधन के दिन भद्रा होती है तो ऐसे में बहनों को अपने भाइयों की कलाई में राखी नहीं बांधनी चाहिए। भद्रा की समाप्ति के बाद ही राखी बांधना चाहिए। इस बार रक्षा बंधन की डेट को लेकर कुछ मतभेद है। दरअसल इस वर्ष श्रावण माह की पूर्णिमा तिथि पर भद्रा का साया रहने के कारण रक्षाबंधन 30 और 31 अगस्त को मनाने को लेकर कंफ्यूजन बना हुआ है। 

रक्षाबंधन पर्व को भाई-बहन के प्रेम और सदभाव के पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है इसके बदले में भाई बहन को भेंट देता है एवं सदैव उसकी रक्षा करने का वचन भी देता है।अच्छे मुहूर्त अथवा भद्रारहित काल में भाई की कलाई में राखी बांधने से भाई को कार्य सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। 

रक्षाबंधन भद्रा पूंछ: 30 अगस्त 2023 की शाम 05:30 बजे से शाम 06:31 बजे तक

रक्षाबंधन भद्रा मुख: 30 अगस्त 2023 की शाम 06:31 बजे से रात 08:11 बजे तक

कब बांधें राखी: 30 अगस्त की रात 09 बजकर 03 मिनट से 31 अगस्त 2023 की सुबह 07 बजकर 07 मिनट तक।

30 अगस्त को भद्रा के कारण राखी बांधने का मुहूर्त दिन में नहीं है। इस दिन रात में 9 बजकर 3 मिनट के बाद राखी बांधने का मुहूर्त है।

31 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा सुबह 07 बजकर 07 मिनट तक है और इस समय में भद्रा नहीं है। ऐसे में 31 अगस्त को सुबह 7 बजे तक बहनें, भाई को राखी बांध सकती हैं।

हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 30 अगस्त 2023 को सुबह 10 बजकर 58 मिनट होगी। जबकि पूर्णिमा तिथि का समापन 31 अगस्त को सुबह 07 बजकर 5 मिनट पर होगा। 

शास्त्रों के अनुसार रक्षाबंधन का त्योहार हमेशा बिना भद्रा काल में मनाना शुभ होता है। अगर रक्षाबंधन के दिन भद्रा रहे तो इस दौरान राखी नहीं बांधनी चाहिए। लेकिन इस साल रक्षाबंधन पर भद्रा का साया रहेगा। हिंदू पंचांग के अनुसार 30 अगस्त को सुबह श्रावण पूर्णिमा तिथि के साथ यानी 10 बजकर 58 मिनट से भद्रा लग जाएगी। जो रात को 09 बजकर 01 मिनट तक रहेगी। इस साल भद्रा रक्षाबंधन के दिन पृथ्वी पर वास करेंगी, जिस कारण से भद्रा में राखी बांधना शुभ नहीं रहेगा। 

रक्षाबंधन का त्योहार भद्राकाल में अशुभ माना गया है। इस वर्ष रक्षाबंधन पर भद्रा का साया रहेगा जिस कारण से राखी के त्योहार को लेकर मतभेद बना हुआ है। हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण पूर्णिमा तिथि लगते ही भद्रा शुरू हो जाएगी। भद्रा का समापन 30 अगस्त की रात को 9 बजकर 01 मिनट पर होगा। मुहूर्त शास्त्र के अनुसार जब भी भद्रा की स्थिति हो ऐसे में भद्रा मुख का त्याग करके भद्रा पूंछ के समय को देखकर शुभ कार्य किया जा सकता है। 30 अगस्त को भद्रा पूंछ का समय शाम 05 बजकर 30 मिनट से लेकर 06 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। वहीं 30 अगस्त को भद्रा मुख का समय शाम 06 बजकर 31 मिनट से लेकर रात 08 बजकर 11 मिनट तक रहेगा।

भद्राकाल के दौरान किसी भी तरह का शुभ कार्य नहीं किया जाता है। भद्रा भगवान सूर्य और माता छाया की पुत्री हैं और शनिदेव इनके भाई हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार भद्रा का जन्म दैत्यों के विनाश के लिए हुआ था। जब भद्रा का जन्म हुआ तो वह जन्म लेने के फौरन बाद ही पूरे सृष्टि को अपना निवाला बनाने लगी थीं। इस तरह से भद्रा के कारण जहां भी शुभ और मांगलिक कार्य, यज्ञ और अनुष्ठान होते वहां विध्न आने लगता है। इस कारण से जब भद्रा लगती है तब किसी भी तरह का शुभ कार्य नहीं किया जाता है। भद्रा को 11 कारणों में 7वें करण यानी विष्टि करण में स्थान प्राप्त है।

वैदिक पंचांग की गणना के मुताबिक भद्रा का वास तीन लोकों में होता है। यानी भद्रा स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी लोक में  वास करती हैं। जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ और मीन राशि में मौजूद होते हैं। तब भद्रा का वास पृथ्वी लोक पर होता है। पृथ्वीलोक में भद्रा का वास होने पर भद्रा का मुख सामने की तरफ होता है। ऐसे में इस दौरान किसी भी तरह का शुभ और मांगलिक कार्य करना वर्जित होता है। भद्रा में किया गया शुभ कार्य कभी भी सफल नहीं होता है।

मुहूर्त्त चिन्तामणि शास्त्र के अनुसार जब भद्रा काल प्रारंभ होता है तो इसमें शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। यहां तक कि यात्रा भी नहीं करनी चाहिए। इसके साथ ही भद्रा काल में राखी बांधना भी शुभ नहीं माना गया है। मान्यता के अनुसार चंद्रमा की राशि से भद्रा का वास तय किया जाता है। गणना के अनुसार चंद्रमा जब कर्क राशि, सिंह राशि, कुंभ राशि या मीन राशि में होता है। तब भद्रा का वास पृथ्वी में निवास करके मनुष्यों को क्षति पहुंचाती है। वहीं मेष राशि, वृष राशि, मिथुन राशि और वृश्चिक राशि में जब चंद्रमा रहता है तब भद्रा  स्वर्गलोक में रहती है एवं देवताओं के कार्यों में विघ्न डालती है। जब चंद्रमा कन्या राशि, तुला राशि, धनु राशि या मकर राशि में होता है तो भद्रा का वास पाताल लोक में माना गया है। भद्रा जिस लोक में रहती है वहीं प्रभावी रहती है।

वैदिक पंचांग के अनुसार श्रावण माह की पूर्णिमा तिथि 30 अगस्त को सुबह 10 बजकर 58 मिनट से शुरू हो जाएगी। लेकिन इसी के साथ भद्रा भी लग जाएगी। भद्राकाल में राखी बांधना अशुभ माना जाता है। भद्रा का समापन 30 अगस्त को रात के 9 बजकर 01 मिनट पर होगा।  

शुभ मुहूर्त शास्त्र के अनुसार रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण माह की पूर्णिमा तिथि और अपराह्र काल यानी दोपहर के समय भद्रा रहित काल में मनाना शुभ होता है। लेकिन इस वर्ष 30 अगस्त को पूरे दिन भद्रा रहेगी। भद्रा में राखी बांधना अशुभ होता है। ऐसे में 30 अगस्त 2023 को रात 09 बजकर 03 मिनट के बाद राखी बांधी जा सकती है। वहीं 31 अगस्त को सुबह 07 बजकर 7 मिनट से पहले राखी बांध सकते हैं।