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मैं भी असली ढोंगी हूं

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धनिकों का बहुत विरोधी हूं

फिर भी मैं धन का लोभी हूं

दर दर भटकूं धन की खातिर

रहने दो मुझे मैं जो भी हूं।

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हूं उग्र स्वभाव का मैं बंदा

पर जीता बहुत संकोची हूं

चिंता का भाव लिए मैं सोचूं

मैं भी एक असली ढोंगी हूं।

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है प्यार भरा दिल में मेरे

फिर भी मैं कितना क्रोधी हूं

तुम सोच रहे क्या चीज़ हूं मैं

मैं ये भी हूं मैं वो भी हूं।

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सुंदर स्वस्थ है तन मेरा

फिर भी मैं मन का रोगी हूं

यश वैभव की परवाह नहीं

क्या मैं भी कोई योगी हूं।

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जीवन में पेलम पेला है

अब चारो ओर झमेला है,

क्या महाभारत की बेला है,

तिल तिल मरती मानवता,

जीवन में पेलम पेला है।

भीड़ भरी इस दुनिया में,

इंसान खड़ा अकेला है,

सुख चैन खोजने भाग रहा,

जिस ग्रह पर दुःख का मेला है।

विज्ञान भरी इस दुनिया में,

नैतिकता का कहां बसेरा है,

परेशान भगवान भी हैं,

इस जग का कहां सवेरा है।

सोच जरा हे नश्वर प्राणी,

क्या तेरा क्या मेरा है,

कुछ करना है तो, कर अच्छा,

यह जग माया का फेरा है।

हाहाकार अशांत है जग,

क्या चलाचली का बेला है

कुछ सूझ रहा नहीं मुझको

ये भी साला एक खेला है।

तुम कब सुधरोगे इंसान

आज के इंसान की सोच इतनी गिर गिर चुकी है कि वह हर किसी को नीचे गिराना चाहता है, दूसरे को अपमानित कर, व्यंग्य कसकर मनोरंजन करना चाहता है। कोई भी पेशा हो कोई भी शहर हो कैसी भी छोटी बड़ी कंपनी हो, चमचों और दलालों की पैठ इतनी गहरी जम चुकी है कि वे मिटाए ना मिटे। मुझे यह समझ नहीं आता कि इन नीच घिनौनी हरकतों से किसी को क्या हासिल होता होगा। गा़ंव, मोहल्ले, शहर हर जगह नीचों, दुष्टों और हरामियों का बोलबाला है।

ये गोलबंदी का युग है। गोलबंदी उन शैतानी ताकतों का जिनके जीवन में न कोई नैतिकता है और ना ही कोई सिद्धांत। इनके जीवन में सिर्फ पैसे और सबसे आगे रहने की भूख है भले ही इसके लिए उन्हें गंदे से गंदा और घटिया से घटिया हरकत क्यों ना करनी पड़े।

ऐसी ओछी हरकतों से तुम्हें कुछ पैसे अधिक मिल जाता होगा कुछ सम्मान मिला जाता होगा लेकिन यह भी सच है नासमझों कि इससे तुम्हारे जीवन में सुकून तो बिल्कुल भी नहीं आता होगा। आखिर एक दूसरे के खिलाफ साजिश करके तुम्हें क्या मिलता है। जितना दिमाग तुम दूसरों को नीचा दिखाने में लगाते हो उतना खुद को बेहतर बनाने में क्यों नहीं लगाते जिससे तुम्हारे जीवन में शांति और आनंद आए।

मेरा कई जगहों पर काम करने का अनुभव है। हर जगह सिर्फ और सिर्फ चापलूसी, चापलूसों का बोलबाला है। इनके मकड़जाल को तोड़ना आसान नहीं है। ऊंचे पदों पर बैठे लोग या तो इस नीच मंडली का हिस्सा बन जाते हैं या कुंडली मारकर आंख मूंदकर मजा लेते हैं। वहीं संस्थाओं के मालिकों की दिलचस्पी सिर्फ पैसा बनाने में है। क्या इंसान जीवन में कुछ अच्छा करने की चाह से विरत हो गया है या इंसान यह भूल गया है कि वह इंसान है। इस समस्या ने बहुत कुछ नष्ट कर रखा है। गांव के गांव उजड़ गए। पंचायत राज व्यवस्था ने गांवों में लोगों को गोलबंदी के दलदल में धकेल दिया। लोगों को जाति संप्रदाय के नाम बांटते बांटते दरार इतनी गहरी कर दी इंसान की जिंदगी कूड़ेदान से बदतर हो गयी। पैसा कमाने के पीछे इंसान नंगा नाच रहा है।

इन विकृतियों को देखकर मुझे भी कुछ अहसास हो रहा है। शायद मौत का त्योहार आने वाला है। क्योंकि….

जब जब मानवता मरती है

पृथ्वी पापों से लदती है

तब इसे बचाने हे प्राणी

प्रकृति प्रकट कुछ करती है।

हौसला आफजाई

आज के दौर में जब मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं और इंसान परेशान है, तो उसके मनोबल और हिम्मत को बढ़ाने के लिए कवियों और साहित्यकारों से बड़ा साथी कोई हो नहीं सकता। निदा फ़ाज़ली का शेर है

मन बैरागी, तन अनुरागी,

क़दम-क़दम दुश्वारी है

जीवन जीना सहज ना जानो,

बहुत बड़ी फ़नकारी है।

साहित्यकार श्रीकांत वर्मा का कथन है कि……

“जब इंसान अपने दर्द को ढो सकने में असमर्थ हो जाता है तब उसे एक कवि की ज़रूरत होती है, जो उसके दर्द को ढोए अन्यथा वह व्यक्ति आत्महत्या कर लेगा।”

तो आइए पढ़ते हैं प्रसिद्ध साहित्यकारों की हौसला आफजाई करने वाली कुछ कालजयी पंक्तियों को।

जीवन का अंतिम सत्य

क्या हार में क्या जीत में,

किंचित नहीं भयभीत मैं,

संघर्ष पथ पर जो मिले,

यह भी सही वह भी सही।

शिवमंगल सिंह सुमन

दाँव पर सब कुछ लगा है,

रुक नहीं सकते

टूट सकते हैं मगर

हम झुक नहीं सकते।

अटल बिहारी बाजपेई

वह पथ क्या

पथिक कुशलता क्या

जिस पथ पर बिखरे शूल न हों

नाविक की धैर्य परीक्षा क्या

जब धाराएँ प्रतिकूल न हों।

जय शंकर प्रसाद

साधो ये मुरदों का गाँव

पीर मरे पैगम्बर मरिहैं,

मरिहैं जिन्दा जोगी

राजा मरिहैं परजा मरिहैं,

मरिहैं बैद और रोगी

चंदा मरिहैं सूरज मरिहैं,

मरिहैं धरणि अकासा

चौदहो भुवन के चौधरी मरिहैं,

इन्हूं की का आसा

नौहूं मरिहैं दसहूं मरिहैं,

मरिहैं सहज अठासी

तैंतीस कोट देवता मरिहैं

बड़ी काल की बाजी

नाम अनाम अनंत रहत है,

दूजा तत्व न होई

कहत कबीर सुनो भाई साधो,

भटक मरो मत कोई।

कबीर दास

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एक युवा लड़की की डायरी

एनी फ्रैंक एक यहूदी लड़की थी जो अपनी मृत्यु के बाद दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गई। उसे यह प्रसिद्धि तब मिली जब उसकी मृत्यु के बाद उसकी लिखी डायरी प्रकाशित हुई। इस डायरी में उसने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजियों के डर से छिपकर रहने के दौरान हुए अनुभवों का सहेजा है। उसकी कहानी यहूदियों के विनाश की इंसानी कीमत और मानवीय भावना के पलटाव की एक प्रतीक बन गई।


एनी फ्रैंक का जन्म 12 जून 1929 को जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर में हुआ था। नाजियों के सत्ता में आने के बाद उसका परिवार 1933 में नीदरलैंड चला गया। उसके पिता को फ्रैंक ने आम्सडर्म में व्यापार के क्षेत्र में कदम रखा। एनी फ्रैंक और उसकी बहन की शिक्षा दीक्षा यहीं शुरू हुई।


1942 में जब नाजियों द्वारा यहूदियों के ज़ुल्म और अत्याचार बढ़ने लगे तो एनी का परिवार ओटो फ्रैंक के आफिस के पीछे बने एक गुप्त मकान में छिपकर रहने लगा। उनके साथ लाने पेल्स नाम का एक और यहूदी परिवार रहने लगा। इस कमरे को जो सबसे ऊपरी मंजिल पर था, लोग गुप्त भवन के रूप में जानते थे।
इसी दौरान एनी ने डायरी लिखनी शुरू कर दी थी। यह डायरी उसने अपनी एक काल्पनिक मित्र जिसका नाम किट्टी था, को संबोधित करते हुए लिखी थी। अपनी इस डायरी में उसने बड़ी साफगोई से अपने विचारों, भावनाओं, अवलोकन और एकान्तवास में रहने की चुनौतियों को उजागर किया है। यह डायरी उसकी बौद्धिक जिज्ञासा, जीवन के सुनहरे स्वपन्नों और भावनात्मक संघर्षों से भी पर्दा उठाती है। लेकिन अगस्त 1944 में किसी ने नाजियों से इनकी मुखबिरी कर दी। इन्हें गिरफ्तार कर नजरबंदी शिविर में भेज दिया गया।
एनी को जर्मनी के एक कैंप में भेज दिया गया जहां 1945 में उसकी मृत्यु हो गई।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जब जर्मन हार चुके थे तो एक व्यक्ति के द्वारा एनी फ्रैंक की डायरी उसके पिता ओटो फैंक को मिली। ओटो ने अपनी लड़की की याद में “गुप्त भवन” के नाम से इस डायरी को प्रकाशित कराया। बाद में कई भाषाओं में “एक युवा लड़की की डायरी” के नाम से इस डायरी का अनुवाद हुआ। यह डायरी अब दुनिया में बहुत अधिक पढ़ी जाने वाली और अनुवादित पुस्तक बन चुकी है। उस गुप्त भवन को अब एनी फ्रैंक म्यूजियम के रूप में विकसित किया गया है जहां हर वर्ष लाखों लोग एनी फ्रैंक के बीते लम्हों की एक झलक पाने की आस में जाते हैं।

Courtesy twitter:Anne Frank

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँक्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ

अपना दुख दर्द छुपाने को
बस बचा एक ही जरिया है
जब पूछे कोई कैसे हो
हम कह देते हैं बढ़िया है।।


चेहरे पर मुस्कान लिए
वाणी में रहते रस घोले
स्वप्न सरीखा यह जीवन
जो सरक रहा होले होले
अश्रु किन्हें हम दिखलाएं
किससे हम मन की बात कहें
बेहतर लगती पीड़ा अपनी
अपने भीतर चुपचाप सहें
कुछ पीड़ा सुन मुस्काएंगे
कुछ नमक छिड़क कर जाएंगे
कुछ पाप पुण्य का लगा गणित
पापों का फल बतलाएंगे
किसकी जिह्वा हम पकड़ेंगे
किस किसके होठ सिलाएंगे
ऐसा बोला तो क्यों बोला
किस-किस से लड़ने जाएंगे
चुपचाप सुनेंगे तानों को
दिल अपना भी एक दरिया है
फिर पूछेगा हाल कोई
तो कह देंगे सब बढ़िया है।।

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ

अपना अस्तित्व बचाने को अपनों से लड़ना पड़ता है

इस पोस्ट में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कुछ कालजयी कविताओं की चुनिंदा पंक्तियां आपके साथ साझा कर रहा हूं। आशा है इन्हें पढ़कर आपको अच्छा लगेगा।

नित जीवन के संघर्षो से,

जब टूट चूका हो अंतर मन।

तब सुख के मिले समंदर का,

रह जाता कोई अर्थ नहीं।

क्षमा शोभती उस भुजंग को,

जिसके पास गरल हो।

उसको क्या, जो दन्तहीन,

विषरहित, विनीत, सरल हो?

जीवन का मूल समझता हूँ,

धन को मैं धूल समझता हूँ।

सौभाग्य न सब दिन सोता है,

देखें, आगे क्या होता है ।

और अधिक ले जांच,

देवता इतना क्रूर नहीं है,

थक कर बैठ गए क्या भाई,

मंजिल दूर नहीं है।

अपना अस्तित्व बचाने को

अपनों से लड़ना पड़ता है,

जब भीष्म अधर्म के रक्षक हों

तो अर्जुन बनना पड़ता है।

टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,

बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,

फण शेषनाग का डोलेगा,

विकराल काल मुँह खोलेगा।

नित जीवन के संघर्षो से,

जब जग जाए अंतर्मन।

फिर सुख की चाह नही,

क्या जीवन और क्या मरन ।।

दुर्योधन! रण ऐसा होगा।

फिर कभी नहीं जैसा होगा।