Category: शायरी दर्द कविता दिल जिंदगी गीत

वाह भाई बीरबल वाह….

दोस्तों, बीरबल अकबर के नौरत्नों में से एक थे जो अपने बहुमूल्य सलाह के लिए जाने जाते थे। उनकी विनोदप्रियता और चतुराई के किस्से देश के कोने कोने में प्रसिद्द थे। खुद अकबर भी उसके प्रसंशक थे। लोकप्रियता में बीरबल का कोई सानी नहीं था।
एक बार अकबर ने अपनी बेगम को तोहफे में बहुमूल्य हार दिया। रानी बहुत खुश हुईं। अकबर ने बेगम को बताया कि उसने इस हार को खास कारीगरों से बनवाया है। रानी ने कहा कि वह इसे हमेशा अपने पास रखेंगी। अकबर को बहुत खुशी हुई। अगले दिन सुबह रानी सोकर उठने के बाद जब नहा कर तैयार होती हैं तो उन्हें हार नही मिलता है। हार के चोरी होने की बात जब अकबर को पता चलती है तो वह गुस्से से तमतमा उठता है। लेकिन रानी को दुखी देखकर अकबर ने कहा कि बेगम आप दुखी ना हों। वो तो मामूली सा तोहफा था, हम आपके लिए और उससे भी अच्छा हार बनवा देंगे। इसके बाद अकबर सिपाहियों और दासियो को आदेश देता है कि वे रानी के कमरे के हर एक कोने में जाकर ढूंढो हार ढूंढें। सिपाही थोड़ी देर बाद आता है और कहता है कि जहाँपनाह हमने हर जगह हार ढूंढा लेकिन हार कहीं नही मिला। अकबर ने कहा मामला गम्भीर है और अब सिर्फ बीरबल ही इस मामले को सुलझा सकते हैं। उसने सिपाहियों से तत्काल बीरबल को बुलावा भेजा। बीरबल के आने पर अकबर ने उसे पूरी घटना बताते हुए कहा कि सच्चाई पता करो।

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बीरबल ने कहा कि हुजूर एक बात तो पक्की है कि चोर सिपाहियों और दासियों में से ही है। इस बात का पता लगाने के लिये मुझे अपने एक दोस्त को बुला कर लाना पड़ेगा। बीरबल ने बताया कि उसका दोस्त कोई ऐसा-वैसा दोस्त नही है, उसके पास जादुई शक्तियां हैं, जो चोर को पकड़ने में मदद करेंगी। बीरबल ने अकबर से कहा कि आप बस रानी के कमरे में पहरा देने वाले सिपाही और दासियों को बुलवाइये, मैं अभी अपने दोस्त को लेकर आता हूँ। थोड़ी देर बाद बीरबल एक गधे को लेकर महल में आते हैं। यह देखकर अकबर बीरबल से पूछा। ये क्या मजाक है, हमने तो तुम्हे तुम्हारा दोस्त लाने को कहा था, ये तो गधा है।
बीरबल ने कहा हुजूर यही ह्मेरा दोस्त है जिसे जादुई शक्ति आती है और यही चोर पकड़ने में हमारी मदद करेगा। बीरबल एक तम्बू में गधे को खड़ा कर देते हैं। फिर बीरबल ने अकबर से कहा कि इस तम्बू के अंदर एक-एक करके सिपाही और दासियो को भेजिए और इन सबको गधे की पूंछ पकड़ कर ये बोलना है कि मैंने चोरी नही की। जब ये सारे लोग गधे की पूंछ पकड़ लेंगे, तभी मेरा दोस्त बताएगा चोर कौन है।
अकबर ने कहा ठीक है। उसने सिपाहियों और दासियो से वैसा ही करने को कहा जैसा बीरबल ने कहा था। और फिर सभी सिपाही और दासी गधे की पूंछ पकड़ते हैं। अंत में बीरबल ने कहा कि अब मैं अपने दोस्त से पूछ कर आता हूँ कि चोर कौन है। कुछ देर बाद बीरबल ने अकबर से कहा कि अब उसे उन सभी सिपाहियों और दासियों के हाथ सूंघने हैं। सभी के हाथ सूंघने के बाद, बीरबल ने एक सिपाही को पकड़कर कहा कि ये सिपाही चोर है। अकबर ने बीरबल से पूछा कि तुम कैसे कह सकते हो कि यही चोर है। तुम गधे की बात कैसे समझ सकते हो।
बीरबल ने कहा जहाँपनाह मैंने उस गधे की पूंछ पर एक खास इत्र लगा दिया था। इसलिए मैंने इन सभी से गधे की पूंछ पकड़ने को कहा और जहाँ पनाह मैं ये भी जानता था कि चोर पकड़े जाने के डर से गधे की पूंछ नही पकड़ेगा। उस इत्र की खुशबू सभी के हाथों में से आ रही थी। लेकिन जब मैंने इसके हाथ सूंघे, तो इसके हाथों में वह खुसबू नही आ रही थी। इसलिए यही चोर है। इस तरह बीरबल ने एक बार फिर अपनी चतुराई से अकबर को मंत्रमुग्ध कर दिया।

घूस चूस कर करो कमाई

करो पढ़ाई बनो कलक्टर, रौशन कर लो नाम

घूस चूस कर खूब कमाओ, भाड़ में गया ईमान

कबीरा सारा रा रा रा ।

माई बिक रही दादा बिक रहे, बिक रहे गांव समाज

नीयत बिक रही भाव बिक रहे, बेशर्म हुआ इंसान

कबीरा सारा रा रा रा ।

धन दौलत पर नारी बिक रही, पैसा बना भगवान

धन की खातिर भाई लड़ रहे, बाप हैं सब परेशान

कबीरा सारा रा रा रा ।

चापलूस दलालों के चंगुल में, तड़प रहा समाज

मेहनत कर्मठ निष्ठाओं का, कहीं नहीं सम्मान

कबीरा सारा रा रा रा ।

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बात बिगड़ जाती है।

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मेरे पास

खामोशी के सिवा

कोई हल नही

मैं बात करता हूँ

तो बात बिगड़ जाती है…!

कुछ खामोशियां,

कुछ बेहिसियां,

और कुछ बदगुमानियां,

कोई भी मज़बूत ईमारत हो

रिश्तों की बुनियाद खा जाती हैं…!

लफ़्ज़ों की चापलूसी,

बाजार के ये रिश्ते

और स्वार्थ की ये दुनिया

सादगी ईमान के

इंसान को खा जाती है।

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मैं वक्त के हाथों में खिलौने की तरह था।

आज के ब्लॉग में मैंने ट्विटर से कुछ बेहतरीन प्रेरणादायक ट्विट्स लिए हैं। इन्हें पढ़कर मन को सुकून मिलता है। टूटे हुए दिल को हौंसला मिलता है। आशा करता हूं कि ये प्रयोग आपको अच्छा लगेगा। आप चाहें तो इन्हें अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर स्टेटस के रूप में भी लगा सकते हैं।

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दुनिया कितनी लाचार है।

चापलूस दलालों की

अब होती जय जय कार है

इसीलिए इस दुनिया का

अब हो रहा सत्यानाश है।

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बेच रहे ईमान सरासर

पाप सभी स्वीकार है

इंसा का इंसा पर अब तो

नहीं रहा ऐतबार है।

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चारो ओर है अंधियारा

बढ़ रहा अत्याचार है

शांति सौहार्द की आस नहीं

दुनिया कितनी लाचार है।

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मरना पड़ता है यहां नाम कमाने के लिए

जान दे सकता है क्या, साथ निभाने के लिए

हौसला है तो बढ़ा, हाथ मिलाने के लिए

मैंने दीवार पे ये क्या लिख दिया

बारिशें होने लगीं, मुझको मिटाने के लिए

फ़िल्म के पर्दे पे छपना कोई आसान नहीं

मरना पड़ता है यहां नाम कमाने के लिए ।

शकील आज़मी

दुख अपना अगर हमको

बताना नहीं आता

तुम को भी तो

अंदाज़ा लगाना नहीं आता –

वसीम बरेलवी………..

और कुछ दिन यहां, रुकने का बहाना मिलता

इस नए शहर में, कोई तो पुराना मिलता।

मुझको हंसने के लिए, दोस्त मयस्सर हैं बहोत

काश रोने के लिए भी कोई शाना मिलता।

मैं तो जो कुछ भी था जितना भी था, सब मिट्टी था

तुम मगर ढूंढते मुझमें, तो ख़ज़ाना मिलता।

शकील आज़मी………..

बात से बात की गहराई चली जाती है,

झूठ आ जाए तो सच्चाई चली जाती है।

हार हो जाती है जब मान लिया जाता है,

जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है।

शकील आज़मी………..

बहा के ले गई जो मौज गहरे पानी में

पता चला कि उसी में मेरा किनारा था

जहां पे लोग मेरी जान लेना चाहते थे

उसी गली से गुज़रना मुझे दोबारा था।

Shakeel Azmi

The Blog

एक छोटी सी कविता from heart.

Social Apps के दौर में सब Porn लेकर आए थे,

हम बहुत खराब थे, जो Blog लेकर आए थे।

कृष्ण जन्माष्टमी विशेष

आज कृष्ण जन्माष्टमी है। इस पवित्र अवसर पर एक छोटी सी कविता प्रस्तुत है। आशा करता हूं कि आपको पसंद आएगा। कृपया Like और Share करना ना भूलें। विनम्र निवेदन है कि ब्लॉग को Subscribe जरुर करें। धन्यवाद।

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हरि चर्चा आनन्द है

जग परिचर्चा व्यस्त

जो कृष्ण नाम का जाप करें

मन केवल उनका मस्त।

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जब रावण जग में आता है

तब धर्म नहीं बच पाता है

तब धीर वीर गंभीर रूप धर

एक राम जगत में आता है।

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अपने और पराए की

जब बात जगत में होती है

अनाचार और पाप मिटाने

श्री कृष्ण की लीला होती है।

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जब पापी की बढ़ती पीड़ा से

धरती रोज कराहेगी

फिर धर्म चक्र की रक्षा को

भगवान की शक्ति आएगी।

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अब कलयुग नाच रहा नंगा

है कौन यहां जो ले पंगा

अब धर्म बचाने हे गिरधर

जल्दी आओ लेकर डंडा।

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भगवान ढूंढने जब मैं निकला

भगवान ढूंढने जब मैं निकला

मन में प्रबल जिज्ञासा थी

पर जीवन के संघर्षों के आगे

कहीं नहीं कोई आशा थी।

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पग पग धोखे मिलते थे

सब भेष बदलकर मिलते थे

दुनिया के तानों को सह कर भी

हम अपनी धुन में रहते थे।

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धन वैभव की चाह नहीं थी

दिन भर चिंतन करते थे

आंख गड़ा सब मुझे निहारें

सनकी पागल कहते थे।

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नहीं राह आसान भक्त की

रह रह कर कांटे चुभते हैं

क्या तकलीफें देकर ही श्रीमन

सच्चे भगत परखते हैं।

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मैं भी असली ढोंगी हूं

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धनिकों का बहुत विरोधी हूं

फिर भी मैं धन का लोभी हूं

दर दर भटकूं धन की खातिर

रहने दो मुझे मैं जो भी हूं।

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हूं उग्र स्वभाव का मैं बंदा

पर जीता बहुत संकोची हूं

चिंता का भाव लिए मैं सोचूं

मैं भी एक असली ढोंगी हूं।

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है प्यार भरा दिल में मेरे

फिर भी मैं कितना क्रोधी हूं

तुम सोच रहे क्या चीज़ हूं मैं

मैं ये भी हूं मैं वो भी हूं।

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सुंदर स्वस्थ है तन मेरा

फिर भी मैं मन का रोगी हूं

यश वैभव की परवाह नहीं

क्या मैं भी कोई योगी हूं।

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