Author: चापलूसों का शिकार

केवल सुखी जीना काफी नहीं, सार्थक जीना जरुरी है। बढ़ती हुई उम्र और नौकरी न मिलने की हताशा एक इंसान को ख़ुद से दूर कर देती है।

हाई प्रोफाइल युद्ध

पुरातत्ववेत्ताओं ने एक अत्याधुनिक ड्रोन का प्रयोग करके प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुए सबसे भीषण युद्ध के बारे में जानकारियां जुटाई हैं। यह युद्ध जर्मनी द्वारा पश्चिमी देशों पर किया गया सबसे प्रमुख युद्ध था और द्वितीय विश्व युद्ध का सबसे खूनी युद्ध था। हालांकि जिस स्थान पर यह लड़ाई लड़ी गई वह बहुत विशाल है और घने जंगल से ढका हुआ है जिसकी वजह से हवाई सर्वेक्षण से भी इस जगह मौजूद अनेकों साक्ष्यों को ढूंढ़ा नहीं जा सकता। फिर भी यह हाई प्रोफाइल युद्ध मैदान है जिसका अध्ययन सैन्य इतिहासकारों द्वारा बड़े स्तर पर किया जाता रहा है। हालांकि मीडिया द्वारा इसकी उपेक्षा होती रही है। इस स्थान से जुड़े रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए टोरोंटो विश्वविद्यालय, खेंट विश्वविद्यालय, बेल्जियम और आर्गस विज़न ने संयुक्त रूप से ड्रोन की मदद से इस युद्ध मैदान का सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारियां एंटीक्विटी नामक एक पत्रिका में प्रकाशित भी हुई। सर्वेक्षण के दौरान अमेरिकी सैन्य विश्राम स्थलों पर जर्मन सैनिकों के साजो सामानों का मिलना यह बताता है कि जर्मन ने अमेरिकी सैन्य अड्डों का इस्तेमाल किया था।

Access to link to the english version.
https://phys.org/news/2023-08-drones-reveal-secrets-world-war.amp#amp_tf=From%20%251%24s&aoh=16934572445505&referrer=https%3A%2F%2Fwww.google.com

Assassination that led to World War 1

The assassination of Archduke Franz Ferdinand of Austria, along with his wife Sophie, on June 28, 1914, in Sarajevo, Bosnia, is widely considered one of the key events that triggered World War I. The assassination set off a chain of events that ultimately led to a global conflict involving many of the world’s major powers. Franz Ferdinand was the heir to the Austro-Hungarian throne. His assassination was carried out by a group of Bosnian Serb nationalists who sought greater autonomy for Slavic peoples in the Balkans, particularly from Austro-Hungarian rule. The group, known as the Black Hand, believed that killing the archduke would help achieve their goals. On June 28, 1914, Franz Ferdinand and his wife Sophie were visiting Sarajevo as part of an official visit to Bosnia. As they were traveling in a motorcade, a young Bosnian Serb nationalist named Gavrilo Princip shot and killed them. The couple was assassinated during a failed attempt earlier that day, but Princip managed to find them later near a café. The assassination set off a series of diplomatic tensions and political maneuvering among European powers. Austria-Hungary blamed Serbia for supporting the nationalist movement that led to the assassination and issued an ultimatum to Serbia, demanding a thorough investigation and measures to suppress anti-Austrian activities. When Serbia’s response did not fully meet Austria-Hungary’s demands, Austria-Hungary declared war on Serbia on July 28, 1914. The complex system of alliances among European powers meant that the declaration of war triggered a chain reaction. Russia, which had cultural and religious ties with Serbia, began to mobilize its forces to support Serbia. Germany, Austria-Hungary’s ally, declared war on Russia, and soon after, Germany declared war on Russia’s ally, France. This led to a swift escalation as more countries became involved in the conflict. The assassination of Franz Ferdinand was the catalyst that set off World War I. The war lasted from 1914 to 1918 and involved many of the world’s major powers. The conflict resulted in widespread destruction, loss of life, and political changes across Europe and beyond. The assassination is often seen as a symbol of the complex and interconnected web of alliances, nationalism, and political tensions that characterized the pre-war period. The war that followed had far-reaching consequences, including the collapse of empires, the redrawing of national boundaries, and significant shifts in global politics. The assassination of Archduke Franz Ferdinand marked the beginning of a devastating conflict that reshaped the course of history and had profound impacts on the 20th century.

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क्या ब्रिक्स तय करेगा नयी वैश्विक व्यवस्था

दर्जनों देश पांच सदस्यीय ब्रिक्स संगठन में शामिल होना चाहते हैं। लेकिन अमेरिकी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने से पहले ब्रिक्स को पहले अपने आपसी मतभेदों को दूर करना होगा।


ब्रिक्स विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, बड़ी आबादी और बड़ी महत्वाकांक्षाएं रखने वाले देशों का संगठन है। ब्राजील रूस भारत चीन और दक्षिण अफ्रीका के देश प्रमुखों की तीन दिवसीय बैठक पर दुनिया भर की निगाहें रहेंगी। यूक्रेन में चल रहे युद्ध और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय द्वारा पुतिन के विरुद्ध जारी वारंट के चलते जोहान्सबर्ग में शुरू इस बैठक में रूसी राष्ट्रपति शामिल नहीं होंगे। चूंकि दक्षिण अफ्रीका अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय का सदस्य है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत उसकी नैतिक जिम्मेदारी होगी कि वह पुतिन को गिरफ्तार करे यदि वह वहां जाते हैं। हालांकि वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए शिरकत करेंगे। युक्रेन में जारी युद्ध और अमेरिका और चीन के बीच तनाव से बदलती भू राजनैतिक परिदृश्य में शुरू हो रही इस बैठक से ब्रिक्स की यह कोशिश होगी कि वह अमेरिकी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को चुनौती दे सके।


ब्रिक्स का विस्तार इस बैठक में प्रमुख मुद्दा रहने वाला है। यह ऐसा समूह है जिसमें देश शामिल होना चाहते हैं। अल्जीरिया से लेकर अर्जेंटीना 40 देशों ने इस संगठन में शामिल होने की रुचि दिखाई है। इस रुचि के पीछे कारण है इस संगठन की बढ़ती आर्थिक शक्ति। क्रय शक्ति समता के मामले में इसने जी 7 को भी पीछे छोड़ दिया है। पूरी दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद में 26 फीसदी हिस्सेदारी ब्रिक्स की है। यद्यपि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में मतदान में इनकी हिस्सेदारी केवल 15 फीसदी है। इन तमाम चुनौतियों के बीच दुनिया के दक्षिणी देश इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अमेरिका प्रतिबंधों की मदद से अपनी मुद्रा डालर को मजबूत बनाने की कोशिश करेगा, जैसा कि इसने रूस के मामले में किया है। अमेरिकी नेतृत्व में चल रही वर्तमान वैश्विक व्यवस्था को तोड़ने के लिए ब्रिक्स देशों ने वैयक्तिक और सामूहिक रूप से अपने पारस्परिक व्यापार अपनी मुद्रा में संपादित कर रहे हैं। ब्रिक्स देश डालर पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं। किसी बदलाव के लिए सहमत होना सामान्य बात है लेकिन इस बदलाव के लिए मिलकर काम कैसे करना है यह अलग बात है। मई, 2020 से ही भारत और चीन सीमा विवाद को लेकर उलझे हैं। वहीं भारत ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका चाहते हैं कि उनका संबंध पश्चिमी देशों के साथ उतना ही मधुर हो जितना चीन और रूस के साथ।


अब सवाल यह उठता है कि क्या ब्रिक्स अमेरिकी नेतृत्व को चुनौती देकर एक मजबूत आर्थिक और राजनीतिक विकल्प बन पाएगा या इस समूह के आंतरिक विवाद इसकी संभावित क्षमता को सीमित कर देंगे। इसका सपाट उत्तर यह दिया जा सकता है कि निश्चित तौर पर ब्रिक्स की पकड़ मजबूत होगी लेकिन यह अमेरिका नेतृत्व वाली व्यवस्था को एकाएक पलट देगा, विश्लेषक ऐसा नहीं देखते। अगर ब्रिक्स के देश अचानक से कोई स्वतंत्र रुख अख्तियार करते हैं तो पश्चिम के साथ उनका तनाव और बढ़ेगा। खुद को प्रभावी बनाए रखने के लिए ब्रिक्स को अपने सदस्य देशों के बीच के मतभेदों के समाधान पर प्राथमिकता देनी होगी जो आसान नहीं होगा। विगत जून में दक्षिण अफ्रीका में संपन्न ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने शुरुआती वक्तव्य में वर्तमान आर्थिक शक्ति के संकेद्रण के बारे में कहा था कि इसमें कुछ आर्थिक संपन्न देशों के रहमो करम पर बहुत सारे देशों को छोड़ दिया गया है। विकासशील देशों में यह भावना गूंजती है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर की शक्ति केवल पांच राष्ट्रों तक सीमित है जो 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की सहमति पर आधारित है। हाल के वर्षों में अमेरिकी आधारित व्यवस्था में मतभेद गहरे हुए हैं। चीन जो अब आर्थिक शक्ति के साथ साथ सैन्य शक्ति भी बन चुका है, अमेरिकी प्रभाव की सीमाओं का इम्तिहान ले रहा है।


ईरानी विदेश मंत्री होसेन अमीर अब्दुल्लाह्यान ने सऊदी अरब का दौरा कर वहां के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की ताकि मिडिल ईस्ट के प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाया जा सके। इस पहल में चीन ने मध्यस्थता की।
यूक्रेन पर रूसी का हमले की पश्चिमी देशों द्वारा निंदा और मास्को और चीन के बीच गहराते रिश्ते ने दरार को बढ़ाया ही है। वहीं भारत ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने एक सधा सधाया अलग रुख अख्तियार करते हुए न तो पश्चिमी प्रतिबंधों का साथ दिया और न ही रूस द्वारा छेड़े गए युद्ध को ही जायज ठहराया।
दुनिया के हिस्सों में अमेरिका का प्रभाव घट रहा है, जिसके ताजा उदाहरण नाइजीरिया और साहेल भी शामिल हैं। अफ्रीका लैटिन अमेरिका, एशिया के उभरते राष्ट्रों मसलन भारत में शीत युद्ध के बाद उभरे एक ध्रुवीय व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का स्वर मजबूती पकड़ रहा है। रूस और चीन ने तो एक तरह से अपने आप को इस स्वर का अगुआ ही घोषित कर दिया है। जुलाई माह में सेंट पीटर्सबर्ग में पुतिन ने एक बैठक में अफ्रीकी नेताओं की उपस्थिति में नेल्सन मंडेला के नाम का जिक्र करते हुए कहा था कि “मुझे लगता है कि अफ्रीकी महाद्वीप के साथ हुए ऐतिहासिक भूल को सुधारने का समय आ चुका है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यों में संशोधन के एक प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान पुतिन ने उपरोक्त बातें कही थी। जी20 की बैठक में भारत ने भी सुरक्षा परिषद में अफ्रीकी प्रतिनिधित्व की बात कही थी।

यह अंश लेख अल जजीरा पर प्रकाशित अंग्रेजी लेख का हिंदी रूपांतरण है। आशा करता हूं कि आपको अच्छा लगा होगा। इसका अंग्रेजी संस्करण पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

https://www.aljazeera.com/features/2023/8/22/can-brics-create-a-new-world-order

अब पढ़िए भाजपा जनसंघ का इतिहास, कांग्रेस और कम्युनिस्ट का चैप्टर समाप्त

नागपुर यूनिवर्सिटी ने MA सेकंड ईयर के सिलेबस से कांग्रेस-कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास को हटाकर भाजपा-जनसंघ का इतिहास जोड़ा है। अगले सत्र से यूनिवर्सिटी में नया सिलेबस लागू किया जाएगा। 

महाराष्ट्र के नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकोजी महाराज यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स को जनसंघ, भाजपा और राम जन्मभूमि का इतिहास पढ़ाया जाएगा। सिलेबस से कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस का इतिहास हटा दिया गया। नागपुर यूनिवर्सिटी के अभ्यास मंडल कमेटी में बहुमत से यह फैसला लिया गया है। अभ्यास मंडल के अध्यक्ष डॉ. शाम कोरेटी ने इसकी पुष्टि की। उन्होंने बताया कि यूनिवर्सिटी के एमए सेकेंड ईयर के सिलेबस में बदलाव किए गए हैं।

अगले सेशन से हिस्ट्री की बुक में स्टूडेंट्स को भाजपा की स्थापना से लेकर साल 2000 तक पार्टी के विस्तार की जानकारी दी जाएगी। इसके अलावा 1980 से 2000 के बीच राम जन्मभूमि आंदोलन के बारे में भी बताया जाएगा।यूनिवर्सिटी ने 2019 में RSS से जुड़ा चैप्टर सिलेबस में जोड़ा था।

हालांकि नागपुर यूनिवर्सिटी में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले साल 2019 में यूनिवर्सिटी ने बीए सेकेंड ईयर के सिलेबस में ‘आरएसएस की राष्ट्र निर्माण में भूमिका’ का चैप्टर जोड़ा था। इसके लिए ‘नेचर ऑफ मॉडरेट पॉलिटिक्स’ और ‘राइज एंड ग्रोथ ऑफ कम्युनलिज्म’ चैप्टर को हटाया गया था। नागपुर को RSS का गढ़ कहा जाता है। RSS का हेडक्वार्टर यहीं पर है। नागपुर यूनिवर्सिटी के सिलेबस में बदलाव पर राजनीतिक विवाद होने के आसार हैं।

इससे पहले राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने 10वीं के कोर्स से पीरियॉडिक क्लासिफिकेशन ऑफ एलीमेंट, प्रजातंत्र, राजनीतिक पार्टी (पूरा पेज), प्रजातंत्र की चुनौतियों वाले पूरे चैप्टर हटा दिए हैं। 

इससे पूर्व इसी साल की शुरुआत में 10वीं क्लास के कोर्स से थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन को हटाने के बाद कई जानकारों ने नाराजगी जाहिर की थी। करीब 1,800 से ज्यादा साइंटिस्ट और टीचर्स ने इसके खिलाफ लैटर लिखा था। 

उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने पानी को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि मांसाहार प्रोसेसिंग में अनाप-शनाप पानी खर्च होता है। मांसाहार नहीं होगा तो कत्लखाने खुद ही बंद हो जाएंगे। इससे प्रदूषण भी होता है।

साथ ही संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि जाति भगवान ने नहीं बनाई है, जाति पंडितों ने बनाई, जो गलत है। भगवान के लिए हम सभी एक हैं। हमारे समाज को बांटकर पहले देश में आक्रमण हुए, फिर बाहर से आए लोगों ने इसका फायदा उठाया। 

सेक्स अपराध नहीं

भारत जैसे रूढ़िवादी समाज में सेक्स की चर्चा आज भी वर्जित या निषेध माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसकी चर्चा गुप्त रूप में होनी चाहिए। यहां तक कि ईश्वर भी सेक्स को अनुमोदित नहीं करता है। हालांकि हमारे वेदों और धर्म ग्रंथो में इसे लेकर कुछ और ही कहा गया है। खोजकर्ताओं के अनुसार पुराने युगों में न केवल इस पर चर्चा होती थी, बल्कि साफ तौर पर इसका प्रचलन था।
यहां कुछ उद्धरण प्रस्तुत हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार दीर्घात्मा नामक एक राजा खुले दरबार में महिलाओं के साथ यौन क्रीड़ा करता था। यहीं नहीं महाराजा रणजीत सिंह खुले आसमान के नीचे दूसरे लोगों की उपस्थिति में काम क्रीड़ा का आनंद उठाते थे। यही नहीं पुराने समय में घाटकानचुकी नामक एक खेल बहुत प्रसिद्ध था जिसमें लोगों के मनोरंजन के लिए कुछ पुरुष और महिलाएं खुल्लम-खुल्ला लोगों के सामने यौन क्रिया करते थे।


प्राचीन धार्मिक पुस्तकों के अनुसार गुरुकुल में सेक्स का औपचारिक ज्ञान बच्चों को दिया जाता था। उस समय गुरुकुल में समृद्ध और संपन्न घरों के बच्चों को अच्छा गृहस्थ आश्रम व्यतीत करने हेतु यौन क्रिया की शिक्षा दी जाती थी।
नारद मुनि ब्रह्म जी के पुत्र थे। इनका जन्म उस समय हुआ था जब प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री को ब्रह्म जी को समर्पित किया था।
महाभारत में वर्णित है उर्वशी ने अर्जुन से कहा था कि यदि कोई स्त्री सेक्स की इच्छा रखती है तो उसकी इच्छा पूरी की जानी चाहिए और यदि ऐसा नहीं होता है तो इससे समाज का अंत हो जाएगा।
उलुपि की कहानी
अर्जुन की चार पत्नियों में से एक और कौरव्या की पुत्री उलुपि ने अर्जुन से कहा था कि यदि कोई पुरुष अपनी कामवासना को शांत करने के लिए किसी स्त्री के साथ रात व्यतीत करता है तो इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है।
ऋग्वेद में एक स्थान पर यम और यामी नामक भाई बहन की चर्चा आती है जिसमें यामी अपनी कामोत्तेजना के लिए यम की ओर उन्मुख होती है।
आदिपर्व में भी कहा गया है कि कामवासना अपराध नहीं है। यह प्रकृति द्वारा सृजित एक प्राकृतिक क्रिया है।
विशेषज्ञों की मानें तो कर्ण के द्वारा शासित प्रदेश अंगदेश में काम क्रीड़ा के लिए महिलाओं और बच्चों का व्यवहार होता था।
महाभारत के आदिपर्व के 63वें अध्याय में वर्णित है कि ऋषि पाराशर सत्यवती मत्स्यगंधा ने वैवाहिक जीवन के पहले ही संसर्ग किया था जिससे उन्हें वेद व्यास नामक पुत्र की प्राप्ति हुई जिन्होंने आगे चलकर महाभारत की रचना की।
प्राचीन ग्रंथ हरिवंश में कहा गया है कि ऋषि वशिष्ठ की पुत्री शतरूपा अपने पिता को ही अपना पति मानती थी और उनके साथ संबंध भी बनाती थी।
हिन्दू देवता इंद्र कई महिलाओं के साथ संबंध बनाने के लिए विख्यात हैं। हरि भविष्य के अनुसार उन्होंने अपने पौत्र की पत्नी वपुश्त्मा के साथ भी काम क्रीड़ा किए थे जिसके लिए उन्हें शापित भी होना पड़ा था।
महाभारत में जिक्र आता है कि एक बार स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी ने अर्जुन से सेक्स की मांग की थी जिस उसने ठुकरा दिया था और उर्वशी ने उसे एक वर्ष के लिए नपुंसक होने का श्राप दे दिया था।
हिन्दू धर्म में कामशास्त्र पर कामसूत्र नामक एक ग्रंथ की भी रचना की गई है जिसमें यौन क्रिया से जुड़े कई पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। महाभारत में यह भी कहा गया है कि पुरुष एक से अधिक महिलाओं के साथ शारीरिक संबंध बना सकता है और यह बुरा व्यवहार नहीं समझा जाना चाहिए। महाभारत में ही यह भी कहा गया है कि पुत्र की प्राप्ति हेतु एक महिला कई पुरुषों से सेक्स संबंध रख सकती है।


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https://www.speakingtree.in/allslides/shocking-sex-secrets-from-the-vedas-that-no-one-knows-about/sexual-acts

गुफाओं का शिकारी

मेघालय निवासी ब्रायन डी खारप्रान आजकल चर्चा में हैं। ख़ासकर तब से जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की बात के 104वें संस्करण में उनके नाम का जिक्र किया है। चर्चा के पीछे उत्तर पूर्वी राज्यों में उनके द्वारा खोजी गयी गुफाएं हैं। स्पेलोलॉजी के प्रति खारप्रान की दिलचस्पी ने उन्हें प्रसिद्ध कर दिया है। स्पेलोलॉजी का मतलब होता है गुफाओं का वैज्ञानिक अध्ययन। अपने प्रयासों के दौरान 76 वर्षीय खारप्रान ने मेघालय एडवेंचर एसोसिएशन की स्थापना भी की है। उन्हें इसकी प्रेरणा कहानियों की किताबों से मिली।

Image courtesy Google: Brian D Kharoran

वर्षों पहले 1964 में एक स्कूल विद्यार्थी के रूप में उन्होंने अपनी पहली खोज शुरू की थी। इसके बाद 1990 में उन्होंने अपने एक मित्र की सहायता से मेघालय एडवेंचर एसोसिएशन की स्थापना की ताकि मेघालय में मौजूद गुप्त गुफाओं की खोज की जा सके। अपने इस संस्था के सहयोग से उत्तर पूर्वी राज्यों में उन्होंने अब तक 1700 से अधिक गुफाओं की खोज की है और इन गुफाओं को उन्होंने विश्व मानचित्र पर भी दर्शा दिया है। बकौल प्रधानमंत्री मेघालय में विश्व की लंबी और गहरी गुफाएं मौजूद है। खारप्रान ने इन गुफाओं के इकोसिस्टम का भी अध्ययन किया है। इन गुफाओं में मौजूद फौना (एक प्रकार की वनस्पति) का भी अध्ययन किया जिनमें से कुछ बहुत ही दुर्लभ प्रजाति की हैं जो बहुत ही कम स्थानों पर पाई जाती हैं। उनके इस प्रयास ने मेघालय को खोज के एक महत्वपूर्ण पर्यटक स्थान के रूप विकसित करने की आवश्यकता को उजागर किया है।


मेघालय
मेघालय को बादलों का घर और पूर्व का स्काटलैंड भी कहा जाता है। मेघालय में भारत की सबसे अधिक गुफाएं हैं। पहले यह आसाम का ही भाग था। बाद में गारो, खासी और जयंतियां के पहाड़ी जिलों को काटकर मेघालय की स्थापना की गई।

एक युवा लड़की की डायरी

एनी फ्रैंक एक यहूदी लड़की थी जो अपनी मृत्यु के बाद दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गई। उसे यह प्रसिद्धि तब मिली जब उसकी मृत्यु के बाद उसकी लिखी डायरी प्रकाशित हुई। इस डायरी में उसने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजियों के डर से छिपकर रहने के दौरान हुए अनुभवों का सहेजा है। उसकी कहानी यहूदियों के विनाश की इंसानी कीमत और मानवीय भावना के पलटाव की एक प्रतीक बन गई।


एनी फ्रैंक का जन्म 12 जून 1929 को जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर में हुआ था। नाजियों के सत्ता में आने के बाद उसका परिवार 1933 में नीदरलैंड चला गया। उसके पिता को फ्रैंक ने आम्सडर्म में व्यापार के क्षेत्र में कदम रखा। एनी फ्रैंक और उसकी बहन की शिक्षा दीक्षा यहीं शुरू हुई।


1942 में जब नाजियों द्वारा यहूदियों के ज़ुल्म और अत्याचार बढ़ने लगे तो एनी का परिवार ओटो फ्रैंक के आफिस के पीछे बने एक गुप्त मकान में छिपकर रहने लगा। उनके साथ लाने पेल्स नाम का एक और यहूदी परिवार रहने लगा। इस कमरे को जो सबसे ऊपरी मंजिल पर था, लोग गुप्त भवन के रूप में जानते थे।
इसी दौरान एनी ने डायरी लिखनी शुरू कर दी थी। यह डायरी उसने अपनी एक काल्पनिक मित्र जिसका नाम किट्टी था, को संबोधित करते हुए लिखी थी। अपनी इस डायरी में उसने बड़ी साफगोई से अपने विचारों, भावनाओं, अवलोकन और एकान्तवास में रहने की चुनौतियों को उजागर किया है। यह डायरी उसकी बौद्धिक जिज्ञासा, जीवन के सुनहरे स्वपन्नों और भावनात्मक संघर्षों से भी पर्दा उठाती है। लेकिन अगस्त 1944 में किसी ने नाजियों से इनकी मुखबिरी कर दी। इन्हें गिरफ्तार कर नजरबंदी शिविर में भेज दिया गया।
एनी को जर्मनी के एक कैंप में भेज दिया गया जहां 1945 में उसकी मृत्यु हो गई।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जब जर्मन हार चुके थे तो एक व्यक्ति के द्वारा एनी फ्रैंक की डायरी उसके पिता ओटो फैंक को मिली। ओटो ने अपनी लड़की की याद में “गुप्त भवन” के नाम से इस डायरी को प्रकाशित कराया। बाद में कई भाषाओं में “एक युवा लड़की की डायरी” के नाम से इस डायरी का अनुवाद हुआ। यह डायरी अब दुनिया में बहुत अधिक पढ़ी जाने वाली और अनुवादित पुस्तक बन चुकी है। उस गुप्त भवन को अब एनी फ्रैंक म्यूजियम के रूप में विकसित किया गया है जहां हर वर्ष लाखों लोग एनी फ्रैंक के बीते लम्हों की एक झलक पाने की आस में जाते हैं।

Courtesy twitter:Anne Frank

“अब मैं दुनिया का विनाशक, मृत्यु बन चुका हूं।”

जूलियस राबर्ट ओपेनहाइमर जोकि जे राबर्ट ओपेनहाइमर के नाम से मशहूर हैं, एक बहुत ही जाने माने भौतिक विज्ञान शास्त्री हैं। इनकी कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विकसित एटम बम से जुड़ी हुई है। 22 अप्रैल 1904 को जन्मे ओपेनहाइमर ने बचपन से भौतिक शास्त्र में अपनी रुचि दिखानी शुरू कर दी थी। उन्होंने हावर्ड यूनिवर्सिटी में अध्ययन किया और बाद में जर्मनी के गाटिंगटन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और वहीं से डाक्ट्रेट की उपाधि हासिल की। ओपेनहाइमर अपनी काबिलियत कें दम पर अपने समय के प्रमुख सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री बन गये। क्वांटम मैकेनिज्म और क्वांटम फील्ड के क्षेत्र में उनकी महती भूमिका है।


लेकिन उनके जीवन में नाटकीय मोड़ तब आया जब वो मैनहाटन परियोजना से जुड़े। यह एक गुप्त योजना थी जिसके अंतर्गत दुनिया के पहले एटम बम को विकसित किया जाना था। योजना के वैज्ञानिक निदेशक के रूप में ओपेनहाइमर ने भौतिक विज्ञान के क्षेत्र से बौद्धिक लोगों को एक साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ताकि एटम बम को बनाया जा सके। उन्होंने न्यू मैक्सिको के लास एलमास प्रयोगशाला का नेतृत्व किया जहां पर ऐतिहासिक खोज और विकास की परियोजनाएं बनाई जाती थीं।
एटम बम बनाने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल और नैतिक रूप से चुनौतीभरा कार्य था क्योंकि इससे दुनिया में बहुत बड़े विनाश के होने का खतरा था। लेकिन ओपेनहाइमर के नेतृत्व ने इस परियोजना में आने वाली सभी चुनौतियों और अभियांत्रिकी समस्याओं पर विजय प्राप्त की। यद्यपि ओपेनहाइमर इस योजना के प्रति पूर्णतया समर्पित थे फिर भी वे इस बात से पूरी तरह वाकिफ थे कि इस घातक हथियार के नैतिक परिणाम क्या होंगे। 1945 में दुनिया के पहले एटम बम के सफल परीक्षण के तुरंत बाद ओपेनहाइमर ने प्रसिद्ध हिन्दू धर्म शास्त्र भगवत् गीता के एक श्लोक के अर्थ को व्यक्त किया था जो इस प्रकार है।
“अब मैं दुनिया का विनाशक मृत्यु बन चुका हूं।”
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ओपेनहाइमर एटामिक ऊर्जा और हथियारों पर नियंत्रण की वकालत करने लगे। अपने राजनैतिक विचारधारा और वामपंथी झुकाव के कारण उन्हें कठिनाईयों का सामना भी करना पड़ा और 1954 में उनको मिली सरकारी सुरक्षा वापस ले ली गई। यहीं से उनके जीवन में कठिनाईयों का दौर शुरू हो गया और विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान पर राजनीति विवाद भारी पड़ने लगे।

Julius Robert Oppenheimer


अपने जीवन में आने वाले इन संघर्षों के बावजूद वे अपना अध्ययन अध्यापन और खोज संबंधी कार्यों का निष्पादन करते रहे। फिर भी भौतिकी के क्षेत्र में वह प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में बने रहे और अपने योगदान के लिए उन्हें बहुत सारे सम्मान भी प्राप्त हुए। 18 फ़रवरी 1967 को उनका देहावसान हो गया लेकिन अपने पीछे वे वैज्ञानिक खोजों और परमाणविक हथियारों के विकास की विरासत छोड़ गए।

All images Courtesy: Twitter

This blog is a Hindi translation of a article from twitter. You can read the original article by accessing the following link 👇👇👇

A Hero Of Humanity

There are a lot of stories of heroes who lived for humanity and obeying the rules of God. Today In this blog I will expose you one such Hero who saved the lives of thousands in the 2nd World War by following the voice of soul.

Chiune Sugihara. Image courtesy: twitter account historic vid

Chiune Sugihara, a Japanese diplomat who served as the vice-consul of the Japanese Consulate in Kaunas, Lithuania during World War II.

Defying the orders of his superiors, he issued transit visas to over 6,000 Jews to enter in Japan.

He worked tirelessly nearly one month, writing visas by hand until the consulate was closed.

Image courtesy: twitter account historic vid

He later said, “I may have to disobey my government, but if I don’t, I would be disobeying God. I knew that somebody would surely complain about me in the future. But I myself thought this would be the right thing to do. There is nothing wrong in saving many people’s lives….The spirit of humanity, philanthropy…neighborly friendship…with this spirit, I ventured to do what I did, confronting this most difficult situation—and because of this reason, I went ahead with redoubled courage.”

Sugihara died in July 31st, 1986 at the age of 86. He was recognized as Righteous Among the Nations by Israel in 1985.

The lesson that we should take from him is that Recognize the inherent value in every person, our shared humanity transcends all barriers. This story is a call to see ourselves in others and act with compassion, even in the face of great risk.

विनाशलीला

पिछले सौ वर्षों का अगर विश्लेषण किया जाए तो यह बात आसानी से समझ में आती है कि दुनिया को अगर किसी देश ने सबसे अधिक प्रभावित किया है तो वो अमेरिका है। बात चाहे दुनिया के आर्थिक तंत्र की हो या विनाश के हथियारों का या फिर हमारे जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली आधुनिक तकनीक तंत्र के विकास का, अमेरिका का प्रभाव हर क्षेत्र में सबसे आगे रहा है। लेकिन अजीब बात यह है कि उसके प्रभाव का परिणाम यह है कि आज पूरी दुनिया में उथल पुथल है। दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं लुढ़कने की कगार पर हैं। कोई भी उपाय कारगर साबित नहीं हो रहा है और आदमी उग्रता की ओर चलने को विवश हो रहा है। दुनिया भर के देश एक दूसरे से लड़ने के लिए विश्व युद्ध की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

दुनिया भर के देशों के लोग अब इस बात की उम्मीद खो रहे हैं कि उनके नेता उनकी बढ़ती हुई परेशानियां और समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हैं। बावजूद इसके आशाएं और उम्मीदें जिंदा हैं लेकिन ऐसी उम्मीदें बहुत गहरा जख्म देने के बाद ही जगती हैं। अब विश्व ऐसे संकट, विनाश और कष्टों के सबसे कठिन दौर से गुजरने का अनुभव करेगा जो उसने शायद ही कभी देखा होगा। इस समय जो भी घटनाएं घटित हो रही हैं वे सभी दैवीय हैं जिनमें से कई घटित भी हो चुकी हैं, जैसे कि 11 सितंबर की घटना, वर्ष 2008 में अर्थव्यवस्थाओं का पतन और कोविड महामारी। पिछले 70 वर्षों में हमने कई बार दुनिया के अंत की चेतावनी सुनी हैं।

आने वाले समय में सबसे पहले जिसका पतध होगा वो देश अमेरिका होगा और जो युद्ध होगा वो मानव जाति का अंतिम संग्राम साबित होगा।

हालांकि इससे पहले की विनाशलीला शुरू हो, ईश्वर चेतावनी जरुर देता है। लेकिन उस विनाशलीला के बाद वो उम्मीद भी जिंदा होगी जो अभी खत्म हो चुकी है। और इसी के साथ इंसान एक बेहतर विश्व में प्रवेश करेगा।

लेकिन उस नये संसार में प्रवेश करने से पहले मानव जाति को विध्वंस और विलोपन के कष्ट को सहन करना होगा। हालांकि ईश्वर ऐसा होने नहीं देंगे। वह अवश्य ही इस विनाशलीला में हस्तक्षेप करेंगे और दुनिया में अपना साम्राज्य स्थापित करेंगे।

This article is a Hindi translation of book “The Fall Of The United States” authored by RONALD WEINLAND. You can access the English version by clicking the following link ,👇👇👇

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