लगभग 2000 लोग प्रत्येक दिन आत्महत्या करके अपनी जान गंवा देते हैं। लेकिन दुनिया भर की सरकारें ऐसे लोगों की सहायता करने की बजाय उन्हें दण्डित करती हैं। लेकिन अब इसमें बदलाव आ रहा है।

प्रतिवर्ष दुनिया में 700000 (7 लाख) लोग खुदकुशी करके अपनी जान दे देते हैं। इसका अर्थ यह हुआ की 2000 लोग रोजाना आत्मघात करते हैं। ऐसे सभी लोगों को जो अपने जीवन को समाप्त कर खत्म करना चाहते हैं, उन्हें सहायता, दया सहानुभूति की जरूरत है।
दुनिया भर के 23 देशों में आत्महत्या करना गैरकानूनी और दंडनीय अपराध है और इसके लिए उन्हें आर्थिक दंड या कारावास की सजा दी जाती है। आत्महत्या जैसे कलंक को मिटाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन और आत्महत्या निवारण हेतु एक अंतरराष्ट्रीय संघ ने मिलकर 10 सितम्बर को विश्व आत्महत्या प्रतिषेध दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इस दिन को दुनिया भर में यह संदेश देने के लिए चुना गया है कि खुदकुशी जैसी घटनाओं को रोका जा सकता है। वर्ष 2023 इसकी आस को जगाता दिख रहा है। क्योंकि अब दुनिया भर में महसूस किया जा रहा है कि आत्महत्या जैसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए। वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य के लिए कार्य कर रही एक संस्था ने इसके लिए एक रूपरेखा भी तैयार कर लिया है। इसके लिए यह संगठन उन देशों पर खुदकुशी संबंधी कानूनों को बदलने का दबाव बना रहा है जहां इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
पिछले कुछ सालों में गुआना पाकिस्तान घाना और मलेशिया ने अपने यहां खुदकुशी को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। ये क्रांतिकारी कानूनी बदलाव न केवल आत्महत्या और खुदकुशी के विचार जैसे कलंक को समाप्त करने की ओर पहला कदम होगा बल्कि यह लोगों को भी इस समस्या को रोकने के लिए आगे आने में मदद करेगा। बहुत सारे देशों में, जो पहले ब्रिटिश कालोनी रह चुके हैं, खुदकुशी कानूनी अपराध माना जाता है जो कि पुराने अंग्रेजी विधान पर आधारित हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि अतीत के इन कानूनी खामियों से नाता तोड़कर एक साहसिक कदम उठाया जाए और आने वाली सदी को बेहतर बनाया जा सके। कष्टों और पीड़ा से जूझ रहे ऐसे लोग जो आत्महत्या करने की सीमा तक पहुंच जाते हैं, उन्हें भी इलाज और सहयोग पाने का अधिकार है। आत्महत्या के मामलों में सजा मिलने के डर के कारण लोग किसी से भी सहयोग या सहायता मांगने से हिचकते हैं और इसी कारण ऐसी घटनाओं की सटीक जानकारी नहीं मिल पाती। इसका मतलब यह हुआ कि सरकारें भी इस समस्या की गंभीरता से अनजान है और इसीलिए इसे रोकने के लिए उनके पास कोई कारगर उपाय नहीं है। यही कारण है कि गुयाना, जहां आत्महत्या के सबसे अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं, इसे कानूनी अपराध की श्रेणी से बाहर करने पर सहमत होते हुए आत्महत्या निवारण विधेयक 2022 को पास किया जिसमें न केवल आत्महत्या को कानूनी अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया बल्कि इसे रोकने के उपायों का भी प्रावधान किया गया है। आज गुयाना में आत्महत्या रोकने के लिए पूरे देश में जगह-जगह केंद्र बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए सार्वजनिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जा रहा है। गुयाना के इन प्रयासों ने सेंट लूसिया, बहामास और सुरीनाम जैसे द्वीपीय और विकासशील देशों को भी खुदकुशी को कानूनी अपराध की श्रेणी से बाहर करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इसी वर्ष ब्रीजटाउन घोषणापत्र पर द्वीपीय और विकासशील देश ने हस्ताक्षर किए हैं जिसमें स्वास्थ्य संबंधी कानूनों में संशोधन और खुदकुशी को गैर कानूनी बनाने की बात कही गई है। घाना ने भी मार्च 2023 को इसे कानूनी दायरे से बाहर कर दिया। केन्या और युगांडा में भी इसे लेकर याचिकाएं दायर हो रही हैं। मलेशिया ने भी इसी वर्ष कानून बनाकर इसे सजा के प्रावधान से मुक्त कर दिया है। बांग्लादेश ने भी इस तरफ अपने कदम बढ़ा दिए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस पहल को समर्थन दे रहा है। आत्महत्या के 77 फीसदी मामले कम और मध्य आय वाले देशों में होते हैं।
आत्महत्या अपराध नहीं है बल्कि मानव अधिकार है जो सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है। अब समय आ गया है कि खराब मानसिक स्वास्थ्य को दण्ड देने की बजाय दुनिया उन लोगों की मदद करें जो दुखों के कारण आत्महत्या करने को प्रेरित होते हैं।
This article is a Hindi translation of news published in Al Jazeera news portal. Read the source here. Click the link below 👇👇👇