जान दे सकता है क्या, साथ निभाने के लिए
हौसला है तो बढ़ा, हाथ मिलाने के लिए
मैंने दीवार पे ये क्या लिख दिया
बारिशें होने लगीं, मुझको मिटाने के लिए
फ़िल्म के पर्दे पे छपना कोई आसान नहीं
मरना पड़ता है यहां नाम कमाने के लिए ।
शकील आज़मी
दुख अपना अगर हमको
बताना नहीं आता
तुम को भी तो
अंदाज़ा लगाना नहीं आता –
वसीम बरेलवी………..
और कुछ दिन यहां, रुकने का बहाना मिलता
इस नए शहर में, कोई तो पुराना मिलता।
मुझको हंसने के लिए, दोस्त मयस्सर हैं बहोत
काश रोने के लिए भी कोई शाना मिलता।
मैं तो जो कुछ भी था जितना भी था, सब मिट्टी था
तुम मगर ढूंढते मुझमें, तो ख़ज़ाना मिलता।
शकील आज़मी………..
बात से बात की गहराई चली जाती है,
झूठ आ जाए तो सच्चाई चली जाती है।
हार हो जाती है जब मान लिया जाता है,
जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है।
शकील आज़मी………..
बहा के ले गई जो मौज गहरे पानी में
पता चला कि उसी में मेरा किनारा था
जहां पे लोग मेरी जान लेना चाहते थे
उसी गली से गुज़रना मुझे दोबारा था।
