भारत की राजधानी दिल्ली में होने जा रही जी -20 बैठक में हिस्सा लेने दुनिया के ताकतवर देशों के राष्ट्र प्रमुख पहुंच चुके हैं। लेकिन एक सवाल जो दिल्ली की धुंधले वातावरण में मंडरा रहा है वह यह कि क्या इस सम्मेलन से किसी उद्देश्य की पूर्ति होगी। विशेषज्ञों की मानें तो इस प्रश्न का उत्तर देना आसान नहीं होगा।
जी 20 की शुरुआत 1999 में एशियाई देशों में आए वित्तीय संकट के परिप्रेक्ष्य में वैश्विक आर्थिक और वित्तीय मुद्दों पर चर्चा करने के लिए वित्त मंत्रियों और केन्द्रीय बैंकों के गवर्नरों के लिए एक मंच के रूप हुआ था। वर्ष 2007 में आए वित्तीय संकट के बाद इस समूह को राष्ट्राध्यक्ष के स्तर पर लाया गया और 2009 में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के लिए इसे प्रमुख मंच के रुप में निर्दिष्ट किया गया। उस समय इसके सदस्य 4 ट्रिलियन डॉलर खर्च कर अपनी और विश्व की अर्थव्यवस्थाओं को पुनर्जीवित करने, व्यापार के मार्ग की रुकावटों और वित्तीय व्यवस्था में सुधार लाने पर सहमत हुए थे। तब से लेकर यह संगठन वित्तीय और आर्थिक मुद्दों, जिसमें अधिकांशत: वैश्विक होते हैं, पर चर्चा करने के लिए हर वर्ष बैठक करता है।

2009 में ईरान का प्रस्तावित न्यूक्लियर प्लांट की ख़बर इसकी बैठक चर्चा के केंद्र बिन्दु में रही थी। 2016 में चीन के हैनझाउ प्रांत में इसकी बैठक में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पेरिस जलवायु समझौते पर दस्तखत किए थे। हाल ही में कोरोना की महामारी के बीच वैक्सीन की उपलब्धता को लेकर जी 20 को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। दुनिया की कुल आबादी के 60 फीसदी हिस्से और कुल आर्थिक उत्पादन के 80 फीसदी की हिस्सेदारी इसी संगठन के पास है। इसीलिए इस संगठन की प्रासंगिकता बढ़ जाती है।

हालांकि वर्तमान में 19 देशों वाले इस समूह, जिसमें अमेरिका, रूस, यूरोपीय संगठन और चीन जैसे विश्व के ताकतवर देश शामिल हैं, की कमी ये है कि इनके हित संरेखित नहीं होते। विल्सन सेंटर स्थित दक्षिण एशिया संस्थान के निदेशक माइकल कुगेलमैन कहते हैं कि जी 7 और जी 20 दोनों महत्वपूर्ण समूह हैं। जी 7 दुनिया के विकसित देशों का छोटा लेकिन प्रभावशाली संगठन है। जबकि जी 20 के सदस्यों में विकासशील, एशिया लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के देश शामिल हैं। यह समूह इस समय एक विशेष भू राजनैतिक क्षण से गुजर रहा है। कुगलमैन कहते हैं कि अगर एक मंच पर अमेरिका और उसके सहयोगी चीन तथा रूस के साथ मौजूद हैं तो दिक्कतें होना लाजिमी है। वर्तमान में रूस यूक्रेन युद्ध के चलते तनाव और भी बढ़ गये हैं। अमेरिका यूक्रेन पर रूसी हमले की निंदा भी कर चुका है और उस पर खड़े आर्थिक प्रतिबंध भी लगा रखा है। अपनी मेजबानी में भारत इस समूह के सदस्यों के बीच सहमति बनाने के लिए संघर्षरत है। इस कार्य में भारत की परेशानियां इसलिए भी बढ़ गई हैं क्योंकि रुसी राष्ट्रपति पुतिन चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग जी 20 की इस बैठक में शामिल नहीं होंगे। खबर है कि मैक्सिको के राष्ट्रपति ए़ड्रीज मैनुअल लोपेज़ ओब्राडोर भी बैठक में हिस्सा ना लें।
इन परिस्थितियों में यदि भारत इस बैठक में संयुक्त घोषणापत्र जारी करवाने में विफल रहता है तो शर्मनाक होगा।
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👉👉👉👉 This is a Hindi translation of an article published in Arabic News Al Jazeera. You are welcome to access the English Version by clicking the following link 👇👇👇