भगवान ढूंढने जब मैं निकला
मन में प्रबल जिज्ञासा थी
पर जीवन के संघर्षों के आगे
कहीं नहीं कोई आशा थी।

पग पग धोखे मिलते थे
सब भेष बदलकर मिलते थे
दुनिया के तानों को सह कर भी
हम अपनी धुन में रहते थे।
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धन वैभव की चाह नहीं थी
दिन भर चिंतन करते थे
आंख गड़ा सब मुझे निहारें
सनकी पागल कहते थे।

नहीं राह आसान भक्त की
रह रह कर कांटे चुभते हैं
क्या तकलीफें देकर ही श्रीमन
सच्चे भगत परखते हैं।
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