क्षमा करें, मैं युद्ध, विध्वंस, विनाश, बर्बादी और तबाही का पैरोकार नहीं हूं। युद्ध एक विभीषिका है, मानवता के लिए अभिशाप है। लेकिन कभी कभी यह मानवता की रक्षा करने के लिए जरूरी हो जाता है। लगता है वह समय नज़दीक है। वर्तमान परिस्थितियां भी विश्व युद्ध का ही संकेत दे रही हैं। पूरी दुनिया में इस समय हलचल है। कूटनीति अपने सबसे चरम बिन्दु पर है। दुनिया दो धड़ों में विभाजित दिखाई दे रही है। कुछ देशों ने अपने अपने पक्ष भी चुन लिए हैं। यूक्रेन में लंबे समय से युद्ध चल रहा है। हजारों मारे जा चुके हैं हजारों बेघर हो चुके हैं। अमेरिका की चौधराहट को चुनौतियां मिल रही हैं। रूस और चीन जैसे बड़े देशों के साथ साथ ईरान जैसे छोटे मुल्क भी लंबे समय से अमेरिका के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं। भारत भी दो पक्षों पर चुनौतियों का सामना कर रहा है। जम्मू कश्मीर को लेकर पाकिस्तान तो अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन से भारत का निर्णायक टकराव आज नहीं तो कल होना ही है। आर्मेनिया और अज़रबैजान रुक रुक कर गोला बारूद की अदला बदली कर ही लेते हैं। इजरायल और फिलिस्तीन की जन्मजात दुश्मनी और संघर्ष बातचीत से हल नहीं होने की दूर दूर तक आस दिखाई नहीं दे रही। इथोपिया अपने पड़ोसी देश इरीट्रिया से संघर्ष कर रहा है।

इन अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के बीच राष्ट्रों के मध्य आर्थिक प्रतियोगिता, देश के नागरिकों का जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर एक दूसरे के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणियां ये बताती हैं कि अब लोगों में धैर्य और सहनशीलता ख़त्म हो चुकी है। अब इंसान में सोचने और विचारने की क्षमता क्षीण हो चुकी है। अब हर कोई अपने को दूसरे से श्रेष्ठ साबित करना चाहता है। अपने विचार अपनी परंपरा अपनी जात और अपना संप्रदाय। कोई किसी को नष्ट करने की बात कर रहा है कोई किसी को। बात इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि अब एक दूसरे के धर्म को नष्ट करने की धमकियां दी जा रही हैं। सुनने में आया है कि किसी दो कौड़ी के नेता ने सनातन को नष्ट करने की इच्छा व्यक्त की है। कम से कम कोई भी सच्चा धर्म दूसरे धर्म को नष्ट करने की मंशा नहीं रखता। और अगर कोई ऐसी भावना पालता है तो प्रकृति उसे उसके धर्म के साथ खुद ही नष्ट कर देती है। ये सारी परिस्थितियां ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि जल्द ही पूरी दुनिया उथल पुथल के दौर से गुजरने वाली हैं।
जब इंसानी फितरत और स्वभाव इस कदर उग्र हो जाए कि वह अपनी जाति, परंपरा, संगठन, संप्रदाय के नाम पर मानवता, समाज, मूल्य, परंपरा और सिद्धांतों की तिलांजलि देने को तैयार हो तो समझ लेना चाहिए कि विध्वंस की बेला दरवाजे पर दस्तक दे रही है। धनबल से निर्बल सताया जा रहा है। असमानता की बात उठाकर लोगों को बरगलाया जा रहा। असमानता तो प्रकृति के मूल में है। एक ही मिट्टी के दो कण कभी भी एक समान नहीं हो सकते लेकिन महत्व दोनों का एक समान है। सृष्टि का सौन्दर्य ही इस बात में समाहित है कि उसकी विषमता में ही समत्व का भाव छिपा है। ज़रुरत है इसी भाव को समझने की ना कि एक दूसरे को एक दूसरे पर थोपने की। धरातल पर समानता लाने की बात मूर्खता है। हां वैचारिक और आत्मिक समानता विषमता में पहले भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी। लेकिन लोगों की समझ में यह बात तब आएगी जब वे एक भयंकर कालचक्र से गुजरेंगे। मुझे ऐसा लगता है कि वह समय बहुत नजदीक है। बहुत सारे लोगों ने अपनी भविष्यवाणियों में इसका संकेत पहले ही दे चुके हैं। दुनिया को चेताने वाले आज भी सावधान कर रहे हैं। लेकिन दुनिया की समझ में यह बात आए तो बात बने।