तुम कब सुधरोगे इंसान

आज के इंसान की सोच इतनी गिर गिर चुकी है कि वह हर किसी को नीचे गिराना चाहता है, दूसरे को अपमानित कर, व्यंग्य कसकर मनोरंजन करना चाहता है। कोई भी पेशा हो कोई भी शहर हो कैसी भी छोटी बड़ी कंपनी हो, चमचों और दलालों की पैठ इतनी गहरी जम चुकी है कि वे मिटाए ना मिटे। मुझे यह समझ नहीं आता कि इन नीच घिनौनी हरकतों से किसी को क्या हासिल होता होगा। गा़ंव, मोहल्ले, शहर हर जगह नीचों, दुष्टों और हरामियों का बोलबाला है।

ये गोलबंदी का युग है। गोलबंदी उन शैतानी ताकतों का जिनके जीवन में न कोई नैतिकता है और ना ही कोई सिद्धांत। इनके जीवन में सिर्फ पैसे और सबसे आगे रहने की भूख है भले ही इसके लिए उन्हें गंदे से गंदा और घटिया से घटिया हरकत क्यों ना करनी पड़े।

ऐसी ओछी हरकतों से तुम्हें कुछ पैसे अधिक मिल जाता होगा कुछ सम्मान मिला जाता होगा लेकिन यह भी सच है नासमझों कि इससे तुम्हारे जीवन में सुकून तो बिल्कुल भी नहीं आता होगा। आखिर एक दूसरे के खिलाफ साजिश करके तुम्हें क्या मिलता है। जितना दिमाग तुम दूसरों को नीचा दिखाने में लगाते हो उतना खुद को बेहतर बनाने में क्यों नहीं लगाते जिससे तुम्हारे जीवन में शांति और आनंद आए।

मेरा कई जगहों पर काम करने का अनुभव है। हर जगह सिर्फ और सिर्फ चापलूसी, चापलूसों का बोलबाला है। इनके मकड़जाल को तोड़ना आसान नहीं है। ऊंचे पदों पर बैठे लोग या तो इस नीच मंडली का हिस्सा बन जाते हैं या कुंडली मारकर आंख मूंदकर मजा लेते हैं। वहीं संस्थाओं के मालिकों की दिलचस्पी सिर्फ पैसा बनाने में है। क्या इंसान जीवन में कुछ अच्छा करने की चाह से विरत हो गया है या इंसान यह भूल गया है कि वह इंसान है। इस समस्या ने बहुत कुछ नष्ट कर रखा है। गांव के गांव उजड़ गए। पंचायत राज व्यवस्था ने गांवों में लोगों को गोलबंदी के दलदल में धकेल दिया। लोगों को जाति संप्रदाय के नाम बांटते बांटते दरार इतनी गहरी कर दी इंसान की जिंदगी कूड़ेदान से बदतर हो गयी। पैसा कमाने के पीछे इंसान नंगा नाच रहा है।

इन विकृतियों को देखकर मुझे भी कुछ अहसास हो रहा है। शायद मौत का त्योहार आने वाला है। क्योंकि….

जब जब मानवता मरती है

पृथ्वी पापों से लदती है

तब इसे बचाने हे प्राणी

प्रकृति प्रकट कुछ करती है।

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