एनी फ्रैंक एक यहूदी लड़की थी जो अपनी मृत्यु के बाद दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गई। उसे यह प्रसिद्धि तब मिली जब उसकी मृत्यु के बाद उसकी लिखी डायरी प्रकाशित हुई। इस डायरी में उसने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजियों के डर से छिपकर रहने के दौरान हुए अनुभवों का सहेजा है। उसकी कहानी यहूदियों के विनाश की इंसानी कीमत और मानवीय भावना के पलटाव की एक प्रतीक बन गई।
एनी फ्रैंक का जन्म 12 जून 1929 को जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर में हुआ था। नाजियों के सत्ता में आने के बाद उसका परिवार 1933 में नीदरलैंड चला गया। उसके पिता को फ्रैंक ने आम्सडर्म में व्यापार के क्षेत्र में कदम रखा। एनी फ्रैंक और उसकी बहन की शिक्षा दीक्षा यहीं शुरू हुई।
1942 में जब नाजियों द्वारा यहूदियों के ज़ुल्म और अत्याचार बढ़ने लगे तो एनी का परिवार ओटो फ्रैंक के आफिस के पीछे बने एक गुप्त मकान में छिपकर रहने लगा। उनके साथ लाने पेल्स नाम का एक और यहूदी परिवार रहने लगा। इस कमरे को जो सबसे ऊपरी मंजिल पर था, लोग गुप्त भवन के रूप में जानते थे।
इसी दौरान एनी ने डायरी लिखनी शुरू कर दी थी। यह डायरी उसने अपनी एक काल्पनिक मित्र जिसका नाम किट्टी था, को संबोधित करते हुए लिखी थी। अपनी इस डायरी में उसने बड़ी साफगोई से अपने विचारों, भावनाओं, अवलोकन और एकान्तवास में रहने की चुनौतियों को उजागर किया है। यह डायरी उसकी बौद्धिक जिज्ञासा, जीवन के सुनहरे स्वपन्नों और भावनात्मक संघर्षों से भी पर्दा उठाती है। लेकिन अगस्त 1944 में किसी ने नाजियों से इनकी मुखबिरी कर दी। इन्हें गिरफ्तार कर नजरबंदी शिविर में भेज दिया गया।
एनी को जर्मनी के एक कैंप में भेज दिया गया जहां 1945 में उसकी मृत्यु हो गई।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जब जर्मन हार चुके थे तो एक व्यक्ति के द्वारा एनी फ्रैंक की डायरी उसके पिता ओटो फैंक को मिली। ओटो ने अपनी लड़की की याद में “गुप्त भवन” के नाम से इस डायरी को प्रकाशित कराया। बाद में कई भाषाओं में “एक युवा लड़की की डायरी” के नाम से इस डायरी का अनुवाद हुआ। यह डायरी अब दुनिया में बहुत अधिक पढ़ी जाने वाली और अनुवादित पुस्तक बन चुकी है। उस गुप्त भवन को अब एनी फ्रैंक म्यूजियम के रूप में विकसित किया गया है जहां हर वर्ष लाखों लोग एनी फ्रैंक के बीते लम्हों की एक झलक पाने की आस में जाते हैं।
