इस पोस्ट में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कुछ कालजयी कविताओं की चुनिंदा पंक्तियां आपके साथ साझा कर रहा हूं। आशा है इन्हें पढ़कर आपको अच्छा लगेगा।

नित जीवन के संघर्षो से,
जब टूट चूका हो अंतर मन।
तब सुख के मिले समंदर का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
क्षमा शोभती उस भुजंग को,
जिसके पास गरल हो।
उसको क्या, जो दन्तहीन,
विषरहित, विनीत, सरल हो?
जीवन का मूल समझता हूँ,
धन को मैं धूल समझता हूँ।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है ।
और अधिक ले जांच,
देवता इतना क्रूर नहीं है,
थक कर बैठ गए क्या भाई,
मंजिल दूर नहीं है।
अपना अस्तित्व बचाने को
अपनों से लड़ना पड़ता है,
जब भीष्म अधर्म के रक्षक हों
तो अर्जुन बनना पड़ता है।
टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
नित जीवन के संघर्षो से,
जब जग जाए अंतर्मन।
फिर सुख की चाह नही,
क्या जीवन और क्या मरन ।।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।